हिमाचल प्रदेश का मध्यकालीन इतिहास | सल्तनत काल 1206 ईस्वी से लेकर 1526 ईस्वी तक
Introduction | परिचय
हिमाचल प्रदेश का मध्यकालीन इतिहास भारतीय इतिहास की उन महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है, जिसमें पहाड़ी रियासतों की स्वतंत्र राजनीतिक परंपरा, राजपूत शासकों का उदय, कांगड़ा की सामरिक शक्ति तथा दिल्ली सल्तनत के साथ उनके संघर्ष और संबंध दिखाई देते हैं। 1206 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद उत्तर भारत में एक नई राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ। दिल्ली सल्तनत के अधीन गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैयद वंश और लोदी वंश ने क्रमशः शासन किया और 1526 ईस्वी में बाबर द्वारा इब्राहिम लोदी की पराजय के साथ सल्तनत काल का अंत हुआ।
हिमाचल प्रदेश का अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के प्रत्यक्ष प्रशासन के अधीन लंबे समय तक नहीं रहा। यहां कांगड़ा, चंबा, मंडी, सुकेत, सिरमौर, कहलूर (बिलासपुर), नूरपुर, हिंदूर (नालागढ़), कुल्लू आदि अनेक छोटी-बड़ी पहाड़ी रियासतें थीं। इन राज्यों की भौगोलिक स्थिति, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र और मजबूत किलों ने उन्हें बाहरी शक्तियों के लिए आसानी से जीतना कठिन बनाया। फिर भी कांगड़ा का नगरकोट दुर्ग और ज्वालामुखी मंदिर अपनी संपन्नता तथा सामरिक स्थिति के कारण दिल्ली के सुल्तानों के लिए विशेष महत्व रखते थे। हिमाचल सरकार के अनुसार भी मुस्लिम आक्रमणों के दौर में पहाड़ी राज्यों ने काफी हद तक अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी और कांगड़ा इस संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा।
सल्तनत काल में हिमाचल के इतिहास को समझने के लिए यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली के सुल्तानों का प्रभाव पूरे हिमाचल पर एक समान नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य अक्सर कांगड़ा जैसे महत्वपूर्ण दुर्गों पर नियंत्रण, मंदिरों की संपत्ति प्राप्त करना, कर/अधीनता स्वीकार करवाना और पहाड़ी क्षेत्रों की राजनीतिक शक्ति को नियंत्रित करना था। इसीलिए हिमाचल प्रदेश के मध्यकालीन इतिहास में दिल्ली सल्तनत का अध्ययन मुख्यतः कांगड़ा और नगरकोट के अभियानों के संदर्भ में किया जाता है।
1. गुलाम वंश : 1206 ईस्वी से 1290 ईस्वी तक
दिल्ली सल्तनत का पहला राजवंश गुलाम या मामलुक वंश था। इसे प्रारंभिक तुर्क अथवा इल्बरी वंश भी कहा जाता है। इसकी स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ईस्वी में की। गुलाम वंश का शासन 1290 ईस्वी तक रहा। इस वंश के प्रमुख शासकों में कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान और बलबन का विशेष महत्व है।
a) हिमाचल पर गुलाम वंश का प्रभाव
गुलाम वंश के समय दिल्ली सल्तनत की शक्ति अभी निर्माण की अवस्था में थी। सुल्तानों को पंजाब, राजस्थान, गंगा-यमुना के मैदान तथा अन्य क्षेत्रों में अपनी सत्ता मजबूत करने की चुनौती थी। इसलिए हिमालयी पहाड़ी क्षेत्रों में उनका प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बाद के तुगलक काल की तुलना में कम दिखाई देता है।
हिमाचल की पहाड़ी रियासतें इस समय काफी हद तक स्वतंत्र थीं। विशेष रूप से कांगड़ा का नगरकोट दुर्ग एक मजबूत राजनीतिक एवं सामरिक केंद्र था। कांगड़ा का क्षेत्र प्राचीन त्रिगर्त परंपरा से जुड़ा हुआ था और यहां कतोच शासकों की मजबूत राजनीतिक उपस्थिति थी। कांगड़ा दुर्ग की प्राकृतिक स्थिति उसे अत्यंत सुरक्षित बनाती थी। आज भी इसे हिमालय के प्रमुख ऐतिहासिक दुर्गों में गिना जाता है।
गुलाम वंश के समय दिल्ली और हिमाचल की पहाड़ी रियासतों के बीच संबंध मुख्यतः पंजाब क्षेत्र के माध्यम से प्रभावित होते थे। दिल्ली की सत्ता का विस्तार पंजाब तक होने के कारण पहाड़ी राज्यों पर राजनीतिक दबाव तो बना, लेकिन दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दिल्ली सल्तनत के लिए इन राज्यों पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना आसान नहीं था।
b) इल्तुतमिश और पहाड़ी क्षेत्र
इल्तुतमिश (1211–1236 ई.) ने दिल्ली सल्तनत को संगठित और मजबूत किया। उसके शासन में सल्तनत की राजनीतिक शक्ति का विस्तार हुआ। हालांकि हिमाचल के पहाड़ी राज्यों को पूर्ण रूप से दिल्ली सल्तनत में शामिल करने की कोई स्थायी प्रक्रिया इस समय दिखाई नहीं देती।
इसका एक प्रमुख कारण हिमाचल की भौगोलिक संरचना थी। ऊंचे पर्वत, संकरी घाटियां, घने जंगल और दुर्गम मार्ग बाहरी सेनाओं के लिए बड़ी चुनौती थे। दूसरी ओर, स्थानीय राजाओं के पास पहाड़ी किलों की मजबूत व्यवस्था थी।
c) बलबन का काल
गयासुद्दीन बलबन (1266–1287 ई.) ने दिल्ली सल्तनत की केंद्रीय सत्ता को मजबूत किया। उसने सीमावर्ती क्षेत्रों में विद्रोहों को दबाने तथा साम्राज्य की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। हालांकि उसके शासन का मुख्य ध्यान उत्तर-पश्चिमी सीमा और आंतरिक विद्रोहों पर था, फिर भी पंजाब और हिमालय की तलहटी में उसकी मजबूत सत्ता का प्रभाव पहाड़ी रियासतों तक पहुंचा।
इस प्रकार गुलाम वंश के दौरान हिमाचल प्रदेश का अधिकांश भाग स्वतंत्र अथवा अर्ध-स्वतंत्र पहाड़ी राज्यों के रूप में अस्तित्व में रहा।
2. हिमाचल का मधयकालीन इतिहास और खिलजी वंश : 1290 ईस्वी से 1320 ईस्वी तक
1290 ईस्वी में गुलाम वंश का अंत हुआ और जलालुद्दीन खिलजी ने खिलजी वंश की स्थापना की। खिलजी वंश का शासन 1290 से 1320 ईस्वी तक रहा। इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अलाउद्दीन खिलजी (1296–1316 ई.) था।
अलाउद्दीन खिलजी ने उत्तर भारत के साथ-साथ गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत में भी बड़े सैन्य अभियान चलाए। उसके समय दिल्ली सल्तनत का विस्तार पहले की तुलना में बहुत अधिक हुआ।
a) हिमाचल के संदर्भ में खिलजी काल
हिमाचल प्रदेश के इतिहास में खिलजी काल का महत्व मुख्यतः इस बात में है कि इस समय दिल्ली सल्तनत की शक्ति पंजाब और उत्तर भारत में काफी मजबूत हो गई थी। लेकिन हिमाचल की ऊंची पहाड़ी रियासतों पर दिल्ली का प्रत्यक्ष और स्थायी प्रशासन स्थापित नहीं हो सका।
कांगड़ा का नगरकोट क्षेत्र इस समय भी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति के लिए जाना जाता था। दिल्ली सल्तनत के लिए कांगड़ा की सबसे बड़ी विशेषता उसका सामरिक महत्व और आर्थिक संपन्नता थी। कांगड़ा दुर्ग और ज्वालामुखी क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठा ने भी इसे विशेष महत्व प्रदान किया।
इस काल में दिल्ली सल्तनत की प्राथमिकता दक्षिण और पश्चिम भारत में विस्तार, मंगोल आक्रमणों से रक्षा तथा राजस्व व्यवस्था को मजबूत करना था। इसलिए हिमाचल के अंदर बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान तुगलक काल की तुलना में कम दिखाई देते हैं।
b) हिमाचल की पहाड़ी रियासतों की स्थिति
खिलजी काल में हिमाचल के विभिन्न भागों में स्थानीय राजवंशों का प्रभाव बना रहा। कांगड़ा के कतोच, चंबा के राजवंश और अन्य पहाड़ी राज्यों ने अपनी स्थानीय सत्ता को बनाए रखा।
यहां यह समझना जरूरी है कि दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक शक्ति का विस्तार और हिमाचल पर प्रत्यक्ष शासन दो अलग बातें थीं। दिल्ली का प्रभाव बढ़ने के बावजूद हिमाचल के अधिकांश पहाड़ी राज्यों में स्थानीय राजाओं का शासन जारी रहा।
3. तुगलक वंश : 1320 ईस्वी से 1414 ईस्वी तक
1320 ईस्वी में गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलक वंश की स्थापना की। इसके बाद मुहम्मद बिन तुगलक (1325–1351 ई.) और फिरोजशाह तुगलक (1351–1388 ई.) जैसे शासकों ने शासन किया। तुगलक काल हिमाचल प्रदेश के मध्यकालीन इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी काल में दिल्ली सल्तनत और कांगड़ा के बीच प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष हुए।
3.1 मुहम्मद बिन तुगलक और हिमाचल
मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का महत्वाकांक्षी शासक था। उसके शासनकाल में सल्तनत की सीमाओं को व्यापक बनाने के अनेक प्रयास किए गए।
हिमाचल के संदर्भ में उसका सबसे महत्वपूर्ण अभियान नगरकोट/कांगड़ा के विरुद्ध माना जाता है।
नगरकोट पर मुहम्मद बिन तुगलक का अभियान
लगभग 1337 ईस्वी में मुहम्मद बिन तुगलक ने नगरकोट अर्थात कांगड़ा की ओर सैन्य अभियान किया। इस समय कांगड़ा क्षेत्र का महत्व उसके मजबूत दुर्ग और राजनीतिक स्थिति के कारण बहुत अधिक था।
कांगड़ा दुर्ग की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि किसी बाहरी सेना के लिए उसे लंबे समय तक घेरे रखना कठिन था। इसके बावजूद तुगलक सेना ने नगरकोट पर दबाव बनाया और दुर्ग पर अपना अधिकार स्थापित किया। कांगड़ा के इतिहास संबंधी विभिन्न स्रोत इस अभियान को 1337 ईस्वी से जोड़ते हैं।
मुहम्मद बिन तुगलक के अभियान का महत्व केवल एक सैन्य विजय तक सीमित नहीं था। इससे यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली सल्तनत अब हिमालय की तलहटी में स्थित महत्वपूर्ण पहाड़ी राज्यों पर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहती थी।
हालांकि मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई और कांगड़ा पर दिल्ली का नियंत्रण स्थायी नहीं रह सका।
3.2 फिरोजशाह तुगलक और कांगड़ा अभियान
हिमाचल प्रदेश के मध्यकालीन इतिहास में फिरोजशाह तुगलक का कांगड़ा अभियान सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
फिरोजशाह तुगलक 1351 ईस्वी में दिल्ली का सुल्तान बना। वह अपने पूर्ववर्ती मुहम्मद बिन तुगलक की तुलना में अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और प्रशासनिक कार्यों के लिए जाना जाता है, लेकिन हिमाचल के संदर्भ में उसने कांगड़ा के विरुद्ध महत्वपूर्ण सैन्य अभियान चलाया।
कांगड़ा पर फिरोजशाह तुगलक का आक्रमण
लगभग 1360–1361 ईस्वी के आसपास फिरोजशाह तुगलक ने नगरकोट की ओर अभियान किया। हिमाचल सरकार के कांगड़ा जिला इतिहास के अनुसार इस अभियान के दौरान कांगड़ा के शासक ने सुल्तान के सामने अधीनता स्वीकार की और उसे अपना राज्य बनाए रखने की अनुमति दी गई।
अन्य ऐतिहासिक विवरणों में कांगड़ा के शासक के रूप में रूपचंद का उल्लेख मिलता है। अभियान के दौरान कांगड़ा दुर्ग को लंबे समय तक घेरा गया। कुछ विवरणों में यह घेराबंदी लगभग छह महीने तक चलने की बात कही गई है। अंततः कांगड़ा के शासक ने सुल्तान के सामने आत्मसमर्पण किया।
ज्वालामुखी मंदिर और पुस्तकें
फिरोजशाह तुगलक के कांगड़ा अभियान का एक महत्वपूर्ण पक्ष ज्वालामुखी मंदिर से संबंधित है। अभियान के बाद सुल्तान को वहां से बड़ी संख्या में धार्मिक एवं विद्वतापूर्ण पुस्तकें प्राप्त हुईं। ऐतिहासिक विवरणों में इन पुस्तकों के संग्रह और उनके अनुवाद का उल्लेख मिलता है।
इस घटना से यह भी पता चलता है कि मध्यकालीन हिमाचल केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक एवं बौद्धिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था। ज्वालामुखी और कांगड़ा क्षेत्र में धार्मिक संस्थानों के पास बड़ी मात्रा में ज्ञान-संपदा मौजूद थी।
कांगड़ा का महत्व
फिरोजशाह तुगलक का अभियान यह प्रमाणित करता है कि दिल्ली सल्तनत कांगड़ा को केवल एक छोटे पहाड़ी राज्य के रूप में नहीं देखती थी। इसके पीछे कई कारण थे—
- कांगड़ा की सामरिक स्थिति।
- नगरकोट दुर्ग की मजबूती।
- पंजाब और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच संपर्क।
- ज्वालामुखी क्षेत्र की धार्मिक प्रतिष्ठा।
- कांगड़ा की आर्थिक एवं मंदिर-संपदा।
- पहाड़ी राज्यों पर राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की इच्छा।
कांगड़ा दुर्ग के बारे में हिमाचल सरकार भी इसे कतोच राजवंश से जुड़ा एक प्रमुख ऐतिहासिक दुर्ग बताती है।
3.3 तुगलक काल में हिमाचल की राजनीतिक स्थिति
तुगलक काल में दिल्ली सल्तनत और हिमाचल की पहाड़ी रियासतों के संबंध केवल युद्ध तक सीमित नहीं थे। कई बार स्थानीय शासक परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली के सुल्तान की अधीनता स्वीकार करते थे, जबकि वास्तविक स्थानीय प्रशासन उनके हाथ में ही रहता था।
इसका प्रमुख कारण था—पर्वतीय भूगोल।
मैदानी क्षेत्रों में बड़ी सेना और प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से सत्ता कायम करना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन हिमाचल में—
- ऊंचे पर्वत,
- दुर्गम दर्रे,
- संकरी घाटियां,
- घने जंगल,
- कठिन जलवायु,
- स्थानीय किलों की मजबूत व्यवस्था
किसी भी बाहरी शक्ति के लिए स्थायी शासन को कठिन बनाते थे।
इसीलिए दिल्ली के सुल्तानों द्वारा कांगड़ा पर अभियान चलाने के बावजूद पूरे हिमाचल पर उनका प्रत्यक्ष प्रशासन स्थापित नहीं हो पाया।
4. तैमूर लंग का आक्रमण : 1398 ईस्वी
तुगलक वंश के अंतिम चरण में दिल्ली सल्तनत राजनीतिक और आर्थिक संकटों से गुजर रही थी। इसी कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर मध्य एशिया के शक्तिशाली शासक तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण किया।
तैमूर ने 1398 ईस्वी में भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली की ओर बढ़ा। उसका अभियान केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पंजाब और हिमालय की तलहटी के कुछ क्षेत्रों पर भी उसका प्रभाव पड़ा।
हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में तैमूर
हिमाचल के मध्यकालीन इतिहास में तैमूर के अभियान का उल्लेख विशेष रूप से कांगड़ा और शिवालिक क्षेत्र के संदर्भ में किया जाता है। उपलब्ध हिमाचली इतिहास संबंधी स्रोतों के अनुसार उस समय कांगड़ा का शासक मेघचंद था। तैमूर के आक्रमण के समय हिंदूर (वर्तमान नालागढ़) का शासक आलमचंद बताया जाता है।
स्थानीय इतिहास संबंधी विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि हिंदूर के शासक आलमचंद ने तैमूर के साथ सहयोग किया और इस कारण उसका क्षेत्र अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुआ। तैमूर के अभियान का प्रभाव शिवालिक और निचले पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुंचा।
तैमूर के आक्रमण का प्रभाव
तैमूर का आक्रमण हिमाचल के लिए किसी लंबे समय तक चलने वाले प्रशासनिक शासन में परिवर्तित नहीं हुआ। उसका मुख्य उद्देश्य भारत में लूट और राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना था। इसलिए वह हिमाचल के पहाड़ी राज्यों को स्थायी रूप से अपने साम्राज्य में शामिल करने के लिए नहीं रुका।
फिर भी उसके आक्रमण ने हिमालय की तलहटी के राज्यों को प्रभावित किया और यह दिखाया कि दिल्ली की केंद्रीय सत्ता कमजोर होने पर बाहरी शक्तियां पंजाब और पहाड़ी क्षेत्रों तक आसानी से पहुंच सकती थीं।
हिमाचल सरकार भी अपने ऐतिहासिक विवरण में उल्लेख करती है कि तैमूर ने निचली पहाड़ियों से होकर अभियान किया, जबकि हिमाचल के पहाड़ी राज्यों ने अलग-अलग परिस्थितियों में इस प्रकार के बाहरी आक्रमणों का सामना किया।
सल्तनत काल और हिमाचल प्रदेश : एक समग्र विश्लेषण
1206 से 1526 ईस्वी तक चलने वाले दिल्ली सल्तनत काल में हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक स्थिति को केवल "दिल्ली सल्तनत के अधीन" कहना सही नहीं होगा। वास्तव में इस पूरे काल में हिमाचल के अधिकांश पहाड़ी राज्य स्थानीय राजवंशों द्वारा शासित स्वतंत्र या अर्ध-स्वतंत्र रियासतें बने रहे।
दिल्ली सल्तनत की रुचि मुख्यतः उन क्षेत्रों में थी जो—
- सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे।
- पंजाब और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच संपर्क मार्ग नियंत्रित करते थे।
- धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से संपन्न थे।
- मजबूत किलों के कारण राजनीतिक शक्ति के केंद्र बने हुए थे।
इनमें नगरकोट अर्थात कांगड़ा सबसे प्रमुख था।
कांगड़ा की भौगोलिक स्थिति और नगरकोट दुर्ग ने इसे सदियों तक बाहरी आक्रमणकारियों के लिए चुनौती बनाए रखा। कांगड़ा के इतिहास में महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद लंबे अंतराल के पश्चात 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के अभियान दिखाई देते हैं। जिला कांगड़ा के आधिकारिक इतिहास में भी उल्लेख है कि 1360 के आसपास फिरोज तुगलक ने कांगड़ा की ओर अभियान किया और वहां के राजा ने अधीनता स्वीकार की।
इस प्रकार मुहम्मद बिन तुगलक और फिरोजशाह तुगलक के अभियान हिमाचल प्रदेश के मध्यकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएं हैं।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
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निष्कर्ष
हिमाचल प्रदेश का मध्यकालीन इतिहास और सल्तनत काल एक ऐसी ऐतिहासिक यात्रा प्रस्तुत करता है जिसमें दिल्ली की बढ़ती राजनीतिक शक्ति और हिमालय की स्वतंत्र पहाड़ी रियासतों के बीच निरंतर संपर्क, संघर्ष और राजनीतिक संतुलन दिखाई देता है। 1206 ईस्वी में गुलाम वंश की स्थापना से लेकर 1526 ईस्वी में लोदी वंश के पतन तक दिल्ली सल्तनत ने उत्तर भारत के बड़े भूभाग पर अपना प्रभाव स्थापित किया, लेकिन हिमाचल के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्र लंबे समय तक स्थानीय राजवंशों के नियंत्रण में रहे।
गुलाम वंश और खिलजी वंश के दौरान हिमाचल पर दिल्ली का प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित रहा, जबकि तुगलक काल में कांगड़ा और नगरकोट के विरुद्ध महत्वपूर्ण सैन्य अभियान हुए। मुहम्मद बिन तुगलक का कांगड़ा अभियान और उसके बाद फिरोजशाह तुगलक का अभियान हिमाचल तथा दिल्ली सल्तनत के संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। कांगड़ा का मजबूत दुर्ग, ज्वालामुखी की धार्मिक प्रतिष्ठा और क्षेत्र की सामरिक स्थिति इसके प्रमुख कारण थे।
इसके बाद 1398 ईस्वी में तैमूर लंग के आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत की कमजोरी को उजागर किया। उसके अभियान का प्रभाव हिमालय की तलहटी और कुछ पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुंचा, लेकिन वह हिमाचल में स्थायी सत्ता स्थापित नहीं कर सका।
अतः हिमाचल प्रदेश के सल्तनत कालीन इतिहास का मूल स्वर दिल्ली की प्रत्यक्ष सत्ता से अधिक स्थानीय पहाड़ी रियासतों की राजनीतिक स्वतंत्रता, कांगड़ा की सामरिक भूमिका, नगरकोट दुर्ग की शक्ति और बाहरी आक्रमणों के विरुद्ध पहाड़ी प्रतिरोध में दिखाई देता है। यही विशेषताएं आगे चलकर हिमाचल प्रदेश के मध्यकालीन इतिहास को मुगल काल और बाद की पहाड़ी रियासतों के इतिहास से जोड़ती हैं।