हिमाचल प्रदेश में 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि और कारण | अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असंतोष का इतिहास
प्रस्तावना
1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी। इस विद्रोह ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता की नींव हिला दी थी। मेरठ से शुरू हुआ यह विद्रोह दिल्ली, कानपुर, झाँसी, लखनऊ और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों तक फैल गया था।
वर्तमान हिमाचल प्रदेश का पहाड़ी क्षेत्र भी इस ऐतिहासिक उथल-पुथल से प्रभावित हुआ था। हालांकि उस समय हिमाचल प्रदेश एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में नहीं था, बल्कि यहाँ अनेक पहाड़ी रियासतें, ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्र और स्थानीय शासकों के अधीन प्रदेश मौजूद थे।
1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि समझने के लिए हमें अंग्रेजों और पहाड़ी रियासतों के बीच हुए पुराने समझौतों, क्षेत्रीय अधिकारों में बदलाव, आर्थिक नीतियों, स्थानीय शासकों के असंतोष और सैनिक छावनियों की परिस्थितियों को समझना आवश्यक है।
इस लेख में हम जानेंगे कि 1857 से पहले हिमाचल की पहाड़ी रियासतों में कैसी राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं, अंग्रेजों के प्रति असंतोष क्यों बढ़ रहा था और किन कारणों से इस क्षेत्र में भी विद्रोह की गतिविधियाँ देखने को मिलीं।
1. 1857 से पहले हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक स्थिति
19वीं शताब्दी के प्रारंभ में वर्तमान हिमाचल प्रदेश का अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र छोटी-बड़ी रियासतों में विभाजित था। इनमें बुशहर, चंबा, बिलासपुर, मंडी, सुकेत, कुल्लू, सिरमौर, केओंथल, बघाल, बघाट, धामी, जुब्बल, नालागढ़ और अन्य रियासतें शामिल थीं।
इन रियासतों के शासकों के पास अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासन चलाने का अधिकार था। लेकिन बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप के कारण इनकी राजनीतिक स्वतंत्रता लगातार प्रभावित हो रही थी।
हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में पहले गोरखाओं का प्रभाव बढ़ा। गोरखा आक्रमण के बाद अंग्रेजों और गोरखाओं के बीच युद्ध हुआ, जिसे आंग्ल-गोरखा युद्ध (1814–1816) कहा जाता है।
अंग्रेजों ने गोरखाओं को पराजित करके पहाड़ी क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया। इसके बाद अनेक पहाड़ी रियासतों के साथ समझौते और सनदें जारी की गईं।
इन समझौतों के माध्यम से अंग्रेजों ने पहाड़ी शासकों पर राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव स्थापित करना शुरू कर दिया।
2. आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद अंग्रेजों का बढ़ता हस्तक्षेप
1815–1816 के बाद अंग्रेजों ने पहाड़ी रियासतों के शासकों को उनकी कुछ पुरानी रियासतें वापस तो दीं, लेकिन सभी क्षेत्रों को उनके नियंत्रण में नहीं लौटाया गया।
ब्रिटिश सरकार ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपने पास रखा। इसके पीछे सैनिक सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों और रणनीतिक महत्व जैसे कारण थे।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक अध्ययन सामग्री के अनुसार अंग्रेजों ने पहाड़ी शासकों के साथ हुई सनदों में कई शर्तें रखी थीं।
इन शर्तों में प्रमुख थीं:
- अंग्रेजी व्यापारियों और उनके सामान को बिना बाधा आवागमन की अनुमति देना।
- आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजों को सैनिक सहायता देना।
- निर्धारित संख्या में बेगार मजदूर उपलब्ध करवाना।
- अपने क्षेत्रों में लगभग 12 फुट चौड़ी सड़कों का निर्माण करवाना।
- पहाड़ी क्षेत्रों में अंग्रेजी अधिकारियों के आवागमन को सुविधाजनक बनाना।
इस प्रकार पहाड़ी रियासतों के शासकों को अंग्रेजों की राजनीतिक और सैन्य आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करना पड़ता था।
3. पहाड़ी रियासतों के पुराने अधिकारों और क्षेत्रों का विवाद
1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में पहाड़ी शासकों का क्षेत्रीय असंतोष भी महत्वपूर्ण था।
1815 के बाद अंग्रेजों ने कई शासकों को उनकी पुरानी रियासतें वापस कीं, लेकिन उनके सभी पारंपरिक अधिकार और क्षेत्र वापस नहीं किए।
अंग्रेजों ने कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा और कुछ क्षेत्रों का हस्तांतरण अन्य रियासतों को कर दिया।
इसके परिणामस्वरूप कई पहाड़ी शासक अंग्रेजी नीतियों से असंतुष्ट थे।
उदाहरण के लिए:
- केओंथल रियासत के कुछ क्षेत्रों को अंग्रेजों ने अपने नियंत्रण में रखा तथा कुछ हिस्सों का हस्तांतरण किया।
- बघाल रियासत के क्षेत्र में भी अंग्रेजों ने अपने हितों के अनुसार बदलाव किए।
- सिरमौर के कुछ पारंपरिक क्षेत्रों पर अंग्रेजों का नियंत्रण स्थापित हुआ।
- नालागढ़ के मालौन किले को अंग्रेजों ने सैनिक महत्व के कारण अपने नियंत्रण में रखा था।
इन घटनाओं ने पहाड़ी शासकों को यह महसूस कराया कि अंग्रेज केवल सुरक्षा देने वाली शक्ति नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय रियासतों के क्षेत्रीय और राजनीतिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर रहे थे।
4. 1846 की लाहौर संधि और पहाड़ी रियासतों में असंतोष
1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि में 1846 की लाहौर संधि का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845–1846) में अंग्रेजों की विजय के बाद 9 मार्च 1846 को लाहौर की संधि हुई।
इस संधि के अंतर्गत सिख दरबार ने सतलुज के दक्षिण के क्षेत्रों तथा जालंधर दोआब सहित कई क्षेत्रों पर अपना अधिकार छोड़ दिया।
पहाड़ी शासकों को उम्मीद थी कि सिख शासन से प्राप्त होने वाले क्षेत्रों को अंग्रेज उन्हें वापस लौटा देंगे। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी अपेक्षाओं के अनुसार सभी क्षेत्र वापस नहीं किए।
इसके बजाय सतलुज और रावी के बीच के कई क्षेत्रों को ब्रिटिश शासन के अधीन रखा गया। कुछ अन्य क्षेत्रों का हस्तांतरण जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह को कर दिया गया।
इससे कांगड़ा, गुलेर, जसवां, दातारपुर, नूरपुर, मंडी, सुकेत, कुल्लू और लाहौल-स्पीति जैसे क्षेत्रों की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हुई।
कुछ पहाड़ी शासकों ने अंग्रेजों से समझौते करके अपनी रियासतों में प्रशासनिक अधिकार बनाए रखे, लेकिन इसके बदले उन्हें अंग्रेजों की शर्तों का पालन करना पड़ता था।
इस प्रकार 1846 के बाद अंग्रेजों का प्रभाव पहाड़ी क्षेत्रों में और अधिक मजबूत हो गया।
5. आर्थिक शोषण और कर संबंधी असंतोष
अंग्रेजों की नीतियों के कारण पहाड़ी रियासतों में आर्थिक और प्रशासनिक दबाव भी बढ़ा।
कुछ रियासतों के शासकों को अंग्रेजों को निर्धारित खिराज देना पड़ता था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने व्यापार, सड़क निर्माण और सैनिक व्यवस्था से संबंधित कई जिम्मेदारियाँ भी स्थानीय शासकों पर डाली थीं।
बुशहर रियासत इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण थी।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री के अनुसार बुशहर से अंग्रेजों द्वारा प्रतिवर्ष 15,000 रुपये का खिराज लिया जाता था।
इस प्रकार की आर्थिक शर्तें स्थानीय शासकों के लिए असंतोष का कारण बनीं।
1857 के विद्रोह के समय बुशहर के राजा शमशेर सिंह ने अंग्रेजों को खिराज देना रोक दिया था। उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों को आवश्यक सहायता और रसद उपलब्ध कराने में भी असहयोग किया।
यह घटना बताती है कि पहाड़ी रियासतों में अंग्रेजों के प्रति राजनीतिक और आर्थिक असंतोष मौजूद था।
6. बेगार प्रथा और स्थानीय जनता की कठिनाइयाँ
हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी रियासतों में बेगार प्रथा लंबे समय से प्रचलित थी।
बेगार का अर्थ है बिना उचित पारिश्रमिक के किसी व्यक्ति से जबरन काम करवाना।
पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों को निम्नलिखित कार्य करने पड़ते थे:
- राजा और उसके अधिकारियों का सामान उठाना।
- अंग्रेज अधिकारियों के यात्रा संबंधी सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना।
- सड़कों और रास्तों की मरम्मत करना।
- सरकारी अधिकारियों के लिए कुली और मजदूर उपलब्ध करवाना।
- राजपरिवार के विशेष अवसरों पर श्रम उपलब्ध करवाना।
- सैनिक छावनियों और सरकारी निर्माण कार्यों में मजदूरी करना।
कई बार लोगों को अपने घरों और खेतों से दूर कई दिनों तक काम करना पड़ता था।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री में बेगार प्रथा को पहाड़ी समाज की महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक समस्या बताया गया है।
हालाँकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बेगार प्रथा का विरोध मुख्य रूप से बाद के दशकों में संगठित आंदोलनों के रूप में सामने आया। इसलिए इसे 1857 के विद्रोह का प्रत्यक्ष और प्रमाणित तात्कालिक कारण नहीं माना जाना चाहिए। यह उस समय की व्यापक सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को समझने में सहायक है।
7. स्थानीय शासकों के आंतरिक मामलों में अंग्रेजों का हस्तक्षेप
अंग्रेजों ने पहाड़ी रियासतों के शासकों को आंतरिक प्रशासन का अधिकार तो दिया था, लेकिन कई मामलों में उनके निर्णयों पर नियंत्रण भी रखा।
राजा की उत्तराधिकार संबंधी समस्या, प्रशासनिक विवाद, राजस्व व्यवस्था और रियासतों के आपसी झगड़ों में अंग्रेज अधिकारी हस्तक्षेप करते थे।
कई बार अंग्रेज किसी शासक को अयोग्य बताकर उसके अधिकार सीमित कर देते थे या प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लेते थे।
इससे पहाड़ी शासकों को अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता कम होने का अनुभव हुआ।
इस प्रकार अंग्रेजों का हस्तक्षेप पहाड़ी रियासतों में असंतोष का एक महत्वपूर्ण कारण बना।
8. अंग्रेजों के प्रति पहले से मौजूद क्षेत्रीय विरोध की पृष्ठभूमि
1857 का विद्रोह अचानक पैदा हुई घटना नहीं थी। इससे पहले भी हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजों और बाहरी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष हुए थे।
1848–1849 के द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के दौरान कांगड़ा क्षेत्र की कुछ पहाड़ी रियासतों में अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष देखने को मिला था।
नूरपुर, कांगड़ा, जसवां और दातारपुर के क्षेत्रों में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाली गतिविधियाँ हुई थीं।
नूरपुर के वजीर राम सिंह पठानिया ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था। अंग्रेजों ने उनके आंदोलन को दबाने के लिए सैनिक कार्रवाई की और अंततः उन्हें गिरफ्तार करके सिंगापुर भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हुई।
इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि 1857 से पहले भी पहाड़ी क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध विरोध की भावना मौजूद थी।
हालाँकि 1848 के क्षेत्रीय संघर्ष और 1857 के व्यापक विद्रोह को एक ही आंदोलन नहीं समझना चाहिए।
9. अंग्रेजी सेना में भारतीय सैनिकों का असंतोष
1857 के विद्रोह के राष्ट्रीय कारणों में भारतीय सैनिकों का असंतोष सबसे महत्वपूर्ण था।
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीय सैनिकों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता था।
इनमें प्रमुख थीं:
- भारतीय सैनिकों और अंग्रेज सैनिकों के बीच वेतन तथा सुविधाओं में अंतर।
- पदोन्नति के सीमित अवसर।
- अंग्रेज अधिकारियों का भेदभावपूर्ण व्यवहार।
- धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में हस्तक्षेप की आशंका।
- सैनिक सेवा की कठिन परिस्थितियाँ।
हिमाचल के कसौली और जुतोग जैसे सैनिक केंद्रों में भी भारतीय सैनिकों के बीच असंतोष था।
1857 में कसौली में तैनात सैनिकों ने विद्रोह किया और जुतोग में तैनात नासिरी बटालियन के सैनिकों में भी अंग्रेजों के प्रति असंतोष दिखाई दिया।
इससे पता चलता है कि राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुआ सैनिक असंतोष हिमाचल की पहाड़ी छावनियों तक भी पहुँचा था।
10. चर्बी वाले कारतूस और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचने का भय
- 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण एनफील्ड राइफल के लिए बनाए गए नए कारतूसों से जुड़ा था।
- इन कारतूसों को प्रयोग करने से पहले दाँतों से काटना पड़ता था।
- भारतीय सैनिकों के बीच यह खबर फैल गई कि कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है।
- गाय हिंदुओं के लिए पवित्र मानी जाती थी, जबकि सूअर मुस्लिम समुदाय के लिए धार्मिक रूप से निषिद्ध था।
- इस खबर से हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएँ प्रभावित हुईं।
- सैनिकों में यह आशंका बढ़ गई कि अंग्रेज जानबूझकर भारतीयों की धार्मिक परंपराओं को समाप्त करना चाहते हैं।
हालाँकि कारतूस विवाद पूरे भारत में 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण बना, लेकिन हिमाचल की पहाड़ी छावनियों में सैनिकों के असंतोष के पीछे वेतन, सुविधाओं और सेवा संबंधी शिकायतें भी महत्वपूर्ण थीं।
11. अंग्रेजों की धार्मिक और सामाजिक नीतियों के प्रति अविश्वास
अंग्रेजों के शासनकाल में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ बढ़ रही थीं।
कुछ भारतीयों को यह आशंका थी कि अंग्रेज सरकार भारतीयों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहती है।
धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में हस्तक्षेप की आशंका के कारण अंग्रेजी शासन के प्रति अविश्वास बढ़ा।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक सामग्री में भी विशेष रूप से शिमला पहाड़ी रियासतों के लोगों के बीच ईसाई मिशनरियों की उपस्थिति से पैदा हुए संदेह का उल्लेख मिलता है।
हालाँकि मिशनरियों की उपस्थिति को पूरे हिमाचल में विद्रोह का प्रत्यक्ष कारण मानना उचित नहीं होगा।
12. 1857 के विद्रोह से पहले अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष के प्रमुख कारण : सारणी
| कारण | प्रमुख प्रभाव |
|---|---|
| आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद अंग्रेजी नियंत्रण | पहाड़ी रियासतों की राजनीतिक स्थिति में बदलाव |
| 1846 की लाहौर संधि | कई पुराने क्षेत्रों पर अंग्रेजों का नियंत्रण |
| क्षेत्रीय अधिकारों का विवाद | स्थानीय शासकों में असंतोष |
| खिराज और आर्थिक शर्तें | रियासतों पर आर्थिक दबाव |
| बेगार प्रथा | स्थानीय जनता का आर्थिक शोषण |
| प्रशासनिक हस्तक्षेप | शासकों की स्वतंत्रता सीमित होना |
| सैनिक असंतोष | अंग्रेजी सेना में विद्रोह की भावना |
| चर्बी वाले कारतूस | सैनिक विद्रोह का तात्कालिक कारण |
| धार्मिक अविश्वास | अंग्रेजी शासन के प्रति संदेह |
13. हिमाचल प्रदेश में 1857 के विद्रोह की शुरुआत और घटनाओं की पृष्ठभूमि
10 मई 1857 को मेरठ में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसके बाद दिल्ली में भी विद्रोह फैल गया।
12 मई 1857 को मेरठ और दिल्ली की घटनाओं की सूचना शिमला पहुँची। अगले दिन अर्थात 13 मई को शिमला के अंग्रेज अधिकारियों को विद्रोह की गंभीरता का पता चला।
उस समय शिमला क्षेत्र में अंग्रेजों की सैनिक छावनियाँ थीं। इनमें जुतोग और कसौली विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री के अनुसार कसौली में तैनात लगभग 80 सैनिकों ने विद्रोह किया और सरकारी खजाने की धनराशि लेकर जुतोग की ओर बढ़े। वहाँ नासिरी बटालियन के सैनिकों में भी असंतोष था।
इसी समय बुशहर के राजा शमशेर सिंह ने भी अंग्रेजों के प्रति असहयोग का रवैया अपनाया।
दूसरी ओर, कई पहाड़ी रियासतों के शासकों ने अंग्रेजों की सहायता की।
इस प्रकार हिमाचल में 1857 का घटनाक्रम राष्ट्रीय विद्रोह से जुड़ा हुआ था, लेकिन इसकी स्थानीय परिस्थितियाँ और राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग थीं।
14. हिमाचल प्रदेश में 1857 के विद्रोह की प्रकृति
हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में 1857 का विद्रोह मैदानी भारत की तरह व्यापक जनविद्रोह नहीं बन पाया।
इसके पीछे कई कारण थे:
- पहाड़ी रियासतों का राजनीतिक और प्रशासनिक ढाँचा अलग-अलग था।
- अनेक स्थानीय शासकों ने अंग्रेजों के साथ समझौते किए थे।
- कई रियासतों ने विद्रोहियों के बजाय अंग्रेजों को सैनिक सहायता दी।
- पहाड़ी क्षेत्रों में विद्रोही सैनिकों के बीच व्यापक संगठन नहीं बन पाया।
- अंग्रेजों की सैनिक और प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत थी।
हिमाचल प्रदेश सरकार के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार पहाड़ी रियासतों के अधिकांश शासक विद्रोह से दूर रहे, जबकि बुशहर के शासक ने अंग्रेजों के हितों के विरुद्ध व्यवहार किया।
इसलिए हिमाचल में 1857 के विद्रोह को सैनिक असंतोष, स्थानीय राजनीतिक विरोध और सीमित विद्रोही गतिविधियों के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
निष्कर्ष
1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि केवल चर्बी वाले कारतूसों तक सीमित नहीं थी। इसके पीछे लंबे समय से जमा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सैनिक असंतोष मौजूद था।
हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी रियासतों में भी अंग्रेजों के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप, पुराने क्षेत्रीय अधिकारों के विवाद, खिराज, प्रशासनिक नियंत्रण और स्थानीय परिस्थितियों ने असंतोष को जन्म दिया था।
हालाँकि सभी पहाड़ी शासकों ने अंग्रेजों का विरोध नहीं किया। कुछ ने विद्रोह में भाग लिया, कुछ ने अंग्रेजों की सहायता की और कुछ ने तटस्थ रहना उचित समझा।
इस प्रकार 1857 का विद्रोह हिमाचल के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने आगे चलकर पहाड़ी क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन और स्थानीय रियासतों के संबंधों को प्रभावित किया।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न एवं तथ्य
प्रश्न 1. 1857 के विद्रोह की शुरुआत कब हुई थी?
उत्तर: 10 मई 1857 को मेरठ से।
प्रश्न 2. 1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारण के रूप में किस घटना को माना जाता है?
उत्तर: एनफील्ड राइफल के चर्बी वाले कारतूसों का विवाद।
प्रश्न 3. आंग्ल-गोरखा युद्ध किस अवधि में हुआ था?
उत्तर: 1814–1816 ई.
प्रश्न 4. प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद लाहौर की संधि कब हुई थी?
उत्तर: 9 मार्च 1846 को।
प्रश्न 5. बुशहर रियासत से अंग्रेजों द्वारा कितना वार्षिक खिराज लिया जाता था?
उत्तर: 15,000 रुपये।
प्रश्न 6. 1857 के विद्रोह के समय बुशहर का शासक कौन था?
उत्तर: राजा शमशेर सिंह।
प्रश्न 7. 1857 के विद्रोह के दौरान शिमला में सैनिक विद्रोह से संबंधित प्रमुख छावनियाँ कौन-सी थीं?
उत्तर: कसौली और जुतोग।
प्रश्न 8. जुतोग में कौन-सी गोरखा सैनिक बटालियन तैनात थी?
उत्तर: नासिरी बटालियन।
प्रश्न 9. मेरठ के विद्रोह की सूचना शिमला कब पहुँची थी?
उत्तर: 12 मई 1857 को इसकी सूचना शिमला पहुँची और 13 मई को वहाँ विद्रोह की खबरों का व्यापक संज्ञान हुआ।
प्रश्न 10. बेगार प्रथा का क्या अर्थ है?
उत्तर: बिना उचित पारिश्रमिक के अनिवार्य रूप से काम करवाना।
प्रश्न 11. 1857 के विद्रोह के समय भारत का शासन किस संस्था के अधीन था?
उत्तर: ईस्ट इंडिया कंपनी।
प्रश्न 12. महारानी विक्टोरिया की शासन घोषणा कब जारी हुई?
उत्तर: 1 नवंबर 1858 को।
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