हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध 44 मेले और त्यौहार और सूची | HP Fairs and Festivals GK

HP Fairs and festivals in Hindi:

हिमाचल प्रदेश के मेले और त्योहार – परिचय

हिमाचल प्रदेश केवल बर्फ से ढके पहाड़ों, हरी-भरी घाटियों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि अपनी समृद्ध देव संस्कृति, लोक परंपराओं, धार्मिक आस्था और रंग-बिरंगे मेलों एवं त्योहारों के लिए भी विशेष पहचान रखता है। हिमाचल को “देवभूमि” कहा जाता है और यहाँ के अनेक मेले-त्योहार सदियों पुरानी परंपराओं, देवी-देवताओं, कृषि, लोककला और सामाजिक जीवन से जुड़े हुए हैं।

हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग जिलों और घाटियों में वर्षभर अनेक धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, कृषि-पशु, व्यापारिक, मौसमी और लोक उत्सव आयोजित किए जाते हैं। कुल्लू दशहरा, मंडी शिवरात्रि, चंबा का मिंजर मेला, रामपुर का लवी मेला, बिलासपुर का नलवाड़ी मेला, रेणुका मेला और मणिमहेश यात्रा जैसे आयोजन प्रदेश की अनूठी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।

इन मेलों में केवल पूजा-पाठ ही नहीं होता, बल्कि लोकनृत्य, लोकगीत, नाटी, पारंपरिक वेशभूषा, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन, पशु एवं कृषि व्यापार तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से हिमाचली जीवन की वास्तविक झलक देखने को मिलती है। कई मेले ऐसे भी हैं जिनका संबंध प्राचीन राजाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और स्थानीय लोककथाओं से जुड़ा हुआ है।

GK Pustak के इस लेख में हम हिमाचल प्रदेश के प्रमुख मेले और त्योहारों के बारे में विस्तार से जानेंगे—कौन-सा मेला कहाँ आयोजित होता है, कब मनाया जाता है, उसका ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व क्या है और उससे जुड़ी प्रमुख परंपराएँ कौन-सी हैं। यह जानकारी हिमाचल प्रदेश के सामान्य ज्ञान, प्रतियोगी परीक्षाओं तथा प्रदेश की संस्कृति और इतिहास को समझने के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगी।

                                


 हिमाचल प्रदेश के मेले और त्यौहार:

1. चंबा जिले के मेले और त्यौहार

1. फूल यात्रा मेला

फूल यात्रा हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के पांगी क्षेत्र में आयोजित होने वाला एक महत्वपूर्ण जिला स्तरीय मेला है। यह मेला प्रत्येक वर्ष अक्टूबर महीने में मनाया जाता है और पांगी घाटी की अनूठी लोक संस्कृति एवं प्राकृतिक सौंदर्य को प्रदर्शित करता है।


इस मेले की सबसे खास विशेषता फूलों की सजावट और प्रदर्शनी है। पांगी क्षेत्र के लोग विभिन्न प्रकार के सुंदर फूलों को एकत्र करते हैं और उन्हें पारंपरिक ढंग से सजाकर मेले में प्रस्तुत करते हैं। स्थानीय लोग फूलों को अपने सिर पर सजाकर भी इस उत्सव में भाग लेते हैं।


फूल यात्रा के माध्यम से स्थानीय लोग प्रकृति के प्रति अपने प्रेम और सम्मान को व्यक्त करते हैं। इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत और लोकनृत्य भी देखने को मिलते हैं। दुर्गम पांगी घाटी की अपनी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं को समझने के लिए यह मेला विशेष महत्व रखता है।


इस प्रकार फूल यात्रा पांगी क्षेत्र की लोक संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक परंपराओं का अनोखा उत्सव है।


2 . सुई मेला (Sui Mela)


सुई मेला हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का एक प्रसिद्ध जिला स्तरीय मेला है। यह मेला प्रत्येक वर्ष अप्रैल महीने में चंबा नगर में आयोजित किया जाता है। यह मेला चंबा की ऐतिहासिक और लोक परंपराओं से जुड़ा हुआ है तथा इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसमें महिलाओं और बच्चों की प्रमुख भागीदारी है।


सुई मेले को चंबा की रानी सुही के बलिदान की स्मृति से जोड़ा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार चंबा नगर में पानी की समस्या को दूर करने के लिए रानी सुही ने अपना बलिदान दिया था। उनके बलिदान की स्मृति में आज भी यह परंपरा श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।


मेले के दौरान महिलाएँ और बच्चे विशेष रूप से इसमें भाग लेते हैं। पारंपरिक गीत, नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चंबा की महिलाओं की पारंपरिक भूमिका और स्थानीय संस्कृति को समझने में यह मेला विशेष महत्व रखता है।


सुई मेले की एक खास बात यह भी है कि इसमें रानी सुही के त्याग और बलिदान की कहानी को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य होता है। इसलिए यह केवल मनोरंजन का मेला नहीं, बल्कि चंबा की ऐतिहासिक स्मृति, नारी त्याग और लोक आस्था का प्रतीक भी है।

3. भरमौर यात्रा

भरमौर यात्रा हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की भरमौर तहसील में आयोजित होने वाली एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा है। यह आयोजन सामान्यतः अगस्त महीने में होता है और भरमौर क्षेत्र के लोगों के लिए इसका विशेष धार्मिक महत्व है।

भरमौर को प्राचीन समय से ही देवी-देवताओं की भूमि माना जाता है। यात्रा के दौरान स्थानीय लोग पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों, देव परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाजों के कारण इस अवसर पर पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा वातावरण बन जाता है।

भरमौर यात्रा स्थानीय देव संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामुदायिक सहभागिता का सुंदर उदाहरण है। क्षेत्र के लोग अपने पारंपरिक परिधानों में शामिल होकर इस परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं।

4. छतराड़ी यात्रा

छतराड़ी यात्रा हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के छतराड़ी क्षेत्र में आयोजित होने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है। यह यात्रा सामान्यतः अक्टूबर महीने में आयोजित की जाती है।

छतराड़ी क्षेत्र की धार्मिक एवं लोक परंपराओं में स्थानीय देवी-देवताओं का विशेष स्थान है। यात्रा के अवसर पर श्रद्धालु देवी के मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

इस दौरान स्थानीय लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आयोजन में भाग लेते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक संस्कृति और सामुदायिक मेल-जोल भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस प्रकार छतराड़ी यात्रा चंबा की प्राचीन देव परंपरा और स्थानीय लोक संस्कृति को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सव है।

5. मणिमहेश यात्रा

मणिमहेश यात्रा हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भरमौर क्षेत्र में आयोजित होने वाली प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा है। यह हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ यात्राओं में से एक है और भगवान शिव की आराधना से जुड़ी हुई है।

यह यात्रा सामान्यतः अगस्त–सितंबर में जन्माष्टमी के आसपास शुरू होकर राधाष्टमी तक चलती है। यात्रा का प्रमुख आकर्षण मणिमहेश झील है, जो समुद्र तल से लगभग 4,080 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और इसके पीछे मणिमहेश कैलाश पर्वत दिखाई देता है।

परंपरागत रूप से यात्रा में छड़ी का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्ग से होते हुए मणिमहेश झील तक पहुँचते हैं और वहाँ पवित्र स्नान करके भगवान शिव की आराधना करते हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार राधाष्टमी के दिन मणिमहेश कैलाश के शिखर पर मणि के दर्शन होने की बात कही जाती है। इसी आस्था के कारण इस दिन विशेष रूप से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मणिमहेश पहुँचते हैं।

यात्रा के दौरान पूरा क्षेत्र “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयकारों से गूँज उठता है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा में शामिल होते हैं।

मणिमहेश यात्रा धार्मिक आस्था, हिमालयी प्रकृति और चंबा की देव संस्कृति का अद्भुत संगम है।

6. भोजरी उत्सव

भोजरी उत्सव हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की स्थानीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा आयोजन है। यह उत्सव मणिमहेश यात्रा के कुछ दिनों बाद आयोजित होने की परंपरा से जुड़ा हुआ है।

इस उत्सव की विशेषता इसकी स्थानीय सामुदायिक भागीदारी और पारंपरिक स्वरूप है। इसमें स्थानीय महिलाएँ और बच्चे विशेष रूप से भाग लेते हैं तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार उत्सव मनाया जाता है।

मेले के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। महिलाओं और बच्चों की भागीदारी इसे अन्य मेलों से अलग पहचान देती है।

भोजरी उत्सव चंबा की स्थानीय लोक परंपराओं और सामुदायिक संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन है।

7. मिंजर मेला

मिंजर मेला हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मेलों में से एक है। यह मेला सामान्यतः जुलाई–अगस्त में आयोजित होता है और लगभग एक सप्ताह तक चलने वाला विशाल धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव है।

मिंजर मेले की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा रावी नदी को मिंजर अर्पित करने की है। स्थानीय भाषा में मक्के के पौधे पर निकलने वाली रेशमी बालियों को मिंजर कहा जाता है। इसे समृद्धि और अच्छी फसल का प्रतीक माना जाता है।

मेले के दौरान भगवान वरुण देव की पूजा से जुड़ी परंपरा भी महत्वपूर्ण है। चंबा के ऐतिहासिक चौगान मैदान में विभिन्न सांस्कृतिक और मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

मिंजर मेले में लोकनृत्य, लोकगीत, नाटी, पारंपरिक वेशभूषा, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन और व्यापारिक गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग इस प्रसिद्ध मेले को देखने के लिए चंबा पहुँचते हैं।

मेले के समापन अवसर पर एक विशेष शोभायात्रा निकाली जाती है और मिंजर को रावी नदी में अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है।

मिंजर मेले का ऐतिहासिक महत्व

मिंजर मेले की शुरुआत चंबा के राजा साहिल वर्मन के शासनकाल से जुड़ी मानी जाती है। इसकी परंपरा चंबा की ऐतिहासिक, धार्मिक और कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।

इस प्रकार मिंजर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंबा की ऐतिहासिक विरासत, कृषि संस्कृति, लोक कला और सामाजिक जीवन का भव्य उत्सव है।

8. सारही मेला (Sarahi Mela)


सारही मेला हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के अर्की में आयोजित होने वाला एक प्रसिद्ध मेला है। यह सोलन जिले के प्रमुख राज्य स्तरीय मेलों में शामिल है। यह मेला हर वर्ष जुलाई महीने में आयोजित किया जाता है और स्थानीय संस्कृति तथा पारंपरिक मनोरंजन के लिए विशेष पहचान रखता है।


सारही मेले का सबसे प्रमुख आकर्षण बैल लड़ाई है। इस अवसर पर आसपास के गाँवों के लोग अपने बैलों को लेकर मेले में पहुँचते हैं। मैदान में बैलों के बीच मुकाबला कराया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण और दर्शक एकत्र होते हैं। यह आयोजन हिमाचल प्रदेश की पुरानी ग्रामीण परंपराओं और पशुपालन से जुड़े जीवन की झलक प्रस्तुत करता है।


मेले के दौरान स्थानीय लोगों में उत्साह और उमंग का वातावरण रहता है। विभिन्न प्रकार की दुकानें, स्थानीय उत्पाद, खान-पान तथा मनोरंजन के कार्यक्रम भी मेले की रौनक बढ़ाते हैं। इस प्रकार सारही मेला अर्की क्षेत्र की ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक मेलों की पहचान को जीवित रखने वाला महत्वपूर्ण आयोजन है।


9. शूलिनी मेला (Shoolini Mela)


शूलिनी मेला हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले का एक प्रसिद्ध राज्य स्तरीय मेला है। यह मेला प्रत्येक वर्ष जून महीने में सोलन नगर में आयोजित किया जाता है। यह मेला सोलन की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सामाजिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।


शूलिनी मेले का नाम माता शूलिनी देवी के नाम पर पड़ा है, जिन्हें सोलन की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। मेले के दौरान माता शूलिनी देवी की शोभायात्रा निकाली जाती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं।


कई दिनों तक चलने वाले इस मेले में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकनृत्य, लोकगीत, खेल प्रतियोगिताएँ और विभिन्न प्रकार की प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती हैं। मेले में स्थानीय व्यापारी और दुकानदार भी भाग लेते हैं, जिससे यह धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र भी बन जाता है।

शूलिनी मेला सोलन की धार्मिक आस्था और हिमाचली लोक संस्कृति का सुंदर संगम है।


10 : त्रिलोकपुर मेला (Trilokpur Mela )

यह मेला हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में मनाया जाता है। यह सिरमौर जिले का राज्य स्तर का मेला है। यह मेला माता बाला सुंदरी को समर्पित है। सिरमौर जिले में यह मेला त्रिलोकपुर नामक पवित्र स्थान में मनाया जाता है। यह मेला हर साल नवरात्रों वाले दिन मनाया जाता है।

11 : रेणुका मेला (Renuka Mela )

यह मेला भी सिरमौर जिले का राज्य स्तर का मेला है। यह मेला रेणुका झील के किनारे मनाया जाता है। यह हर साल मेला नवंबर महीने में मनाया जाता है।

12 : पावन द्वादसी मेला

यह मेला हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का जिला स्तर का मेला है। सिरमौर में यह मेला सुरहा नामक स्थान पर मनाया जाता है। यह मेला हर साल सितम्बर महीने में मनाया जाता है। इस मेले में सिरमौर के लोग हर्षोउल्लास से हिस्सा लेते है।

13 :  पिपलू मेला (Piplu Mela )

हिमाचल प्रदेश में यह मेला ऊना जिले में मनाया जाता है। यह ऊना जिले का जिले स्तर का मेला है। यह मेला पिपलू नामक स्थान पर मनाया जाता है। यह मेला साल के मई जून में मनाया जाता है। माना जाता है की यहां के लोग यहां के पीपल के वृक्ष की पूजा करते है जिसके पीछे एक पुराना इतिहास है .

14 : चिंतपूर्णी मेला :

यह मेला हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में मनाया जाता है। यह मेला ऊना जिले का ये भी राज्य स्तर का मेला है। यह मेला माँ चिंतपूर्णी को समर्पित है। इस मेले मैं माँ चिंतपूर्णी की पूजा बड़ी ही धूमधाम से की जाती है। हिन्दू धर्म के अनुसार माँ चिंतपूर्णी को चिंता को हरने वाली मन जाता है। यह मेला अक्टूबर में हर साल लगता है।

15 : बाबा बड़भाग सिंह मेला (बाबा Vadbhag Singh Fair )

हिमाचल प्रदेश में यह मेला ऊना जिले में मनाया जाता है। यह मेला भी ऊना जिले का राज्य स्तरीय मेला है। ये मेला हर साल जून महीने में मनाया जाता है। ये मेला हिन्दू न केवल हिन्दू धर्म बल्कि सिख धर्म के लिए भी बहुत मान्य मन जाता है। कहीं न कहीं बाबा बड़भाग सिंह का मेला हिन्दू और सिख धर्म धार्मिक आस्था के साथ जुड़ा हुआ है।

16 : नलवाड़ी मेला (Nalwadi Fair )

यह मेला हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले का एक महत्वपूर्ण और मशहूर मेला है। यह मेला केहलूर के शासक अमर चंद द्वारा शुरू करवाया गया था। इसका दूसरा नाम "पशु मेला " है अर्थात इसे पशु मेले के नाम से भी जाना जाता है। अगर हम इसके इतिहास के बात करें तो यह मेला W Goldstin ने 1889 में शुरू करवाया था। नलवाड़ के मेले में बेलों की पूजा की जाती है। यह मेला बिलासपुर के जहनु मैदान में मनाया जाता है। ही मेल्स हर साल मार्च महीने में शुरू होता है।

17 :  नैना देवी मंदिर मेला (Naina Devi Fair )

यह मेला भी बिलासपुर जिए में मनाया जाता है। यह मेला बिलासपुर जिले का राज्य स्तरीय मेला है। यह मेला हर साल अगस्त ही महीने में मनाया जाता है। यह मेला बिलसपुर जिले के नैना देवी मंदिर में हर साल आयोजित किया जाता है। और यहां के लोग माता नैना देवी की पूजा बड़ी ही धूमधाम से करते है।

18 : गुग्गा मेला  (Guga Fair )

यह मेला भी बिलासपुर जिले का राज्य स्तरीय मेला है। बिलासपुर जिले में यह विहृरु मेला नामक स्थान पर मनाया जाता है।यह मेला अगस्त के अंत में शुरू होता है या सितंबर के शुरुआत शुरुआत में मनाया जाता है।

19 : मारकंडा मेला (Markanda Fair )

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले का यह मेला हर साल अप्रैल में मनाया जाता है। यह मेला बिलासपुर जिले के जुखाला नामक स्थान पर मनाया जाता है। यह माना जाता है की यह मेला ऋषि मार्कंड़य को समर्पित है।

20 : ढुंगरी मेला (Dhungri Fair)

यह मेला हिमाचल प्रदेश के ज़िला कुल्लू के मनाली में मनाया जाता है मनाली एक मशहूर सैलानी स्थल भी है। यह कुल्लू किले में मेला गर्मियों में मई महीने में मनाया जाता है। यह माना जाता है यह मेला महाभारत काल के माँ हिडिम्बा को समर्पित है।

21:.बूढी दीवाली

यह मेला हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में मनाया जाता है। यह मेला हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले के निरमंड नामक स्थान में मनाया जाता है। वहां के लोगों का यह विचार है की इस मेले का संबध महा भारत से है। यह मेला लगातार तीन दिन तक चलता है और यह मेला अमावस के दिन मनाया जाता है।

22 : भुण्डा उत्सव (Bhunda Utsav )

यह मेला भी हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले में ही में मनाया जाता है। यह मेला कुल्लू जिले के निरमंड में ही में मनाया जाता है इस मेले की विशेषता ये है की यह मेला भी कुंभ मेले के साथ ये मिलती है की ये भी कुंभ मेले की भांति हर 12 साल बाद मनाया जाता है। भुण्डा मेले का संबंध भगवान परशुराम से माना जाता है।

23 : कुल्लू का दशहरा (Dussehra )

यह मेला कुल्लू जिले का एक राष्ट्रीय स्तर का मेला है इस मेले की यह विशेषता कि यह लगातार 7 दिन तक चलता है। इस मेले की शुरुआत 1651 ई में वहां के राजा जगत सिंह द्वारा की गई। कुल्लू का दशहरा मशहूर मैदान ढालपुर में मनाया जाता है।

24 : पुरग मेला (Purag Mela )

यह मेला हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में मनाया जाता है। यह मेला शिमला जिले के कोटखाई इलाके में मनाया जाता है। यह मेला हर साल अप्रैल महीने में मनाया जाता है। यह मेला भोले शंकर महादेव को समर्पित है।

25 : फ़ाग मेला (Fag Mela )

यह मेला भी हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले  में मनाया जाता है। यह मेला भी शिमला जिले का एक ज़िला स्तर का मेला है। यह मेला रामपुर नामक स्थान पर मनाया जाता है। यह मेला हर साल फागुन महीने में मनाया जाता है।

26 : भैंसो का मेला (fair of Buffaloes )

यह मेला भी शिमला जिले में मनाया जाता है। यह मेला शिमला जिले के मशोबरा नामक स्थान में मनाया जाता है। हर साल सितम्बर महीने में इस मेले का आयोजन होता है। इसे भैंसों का मेला इसलिए खा जाता है किउंकि यहां पर बढ़िया-बढ़िया किसम के नस्ल की भैसों की प्रदर्शनी होती है।

27 : पत्थर का मेला

यह मेला शिमला जिले में मनाया जाता है। यह मेला शिमला जिले के मशोबरा नामक मशहूर स्थान पर मनाया जाता है। यह मेला हर साल सितम्बर महीने में मनाया जाता है। इसे पत्थर का मेला इसलिए कहा जाता है .

28 : रोहड़ू मेला (Rohru Mela )

यह मेला मेला भी हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में मनाया जाता है। यह मेला शिमला जिले के रोहड़ू में मनाया जाता है।यह मेला हिमाचल के मेलों में से राज्य स्तर का मेला है। यह मेला हर साल अप्रैल महीने में मनाया जाता है। इस मेले में रोहड़ू के culture की एक बहुत बढ़िया झलक देखने को मिलती है। .

29 : ग्रीष्मोत्स्व मेला

यह मेला शिमला जिले के साथ सिरमौर में भी मनाया जाता है पर शिमला में यह बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह मेला शिमला जिले का राष्ट्रीय स्तर का मेला है। इस मेले की शुरूआत हर साल मई महीनें होती है ये शिमला मैं बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह मेला ग्रीष्म ऋतू में मनाया जाता है इसलिए इसे ग्रीष्मोत्सव मेले का नाम दिया गया है।

30 : महासू नाग मेला (Mhasu Nag Mela )

यह मेला मंडी जिले में मनाया जाता है। यह मेला ज़िला मंडी का ज़िला स्तर का मेला है। मंडी जिले में यह मेला करसोग नामक स्थान पर मनाया जाता है। यह मेला हर साल के मई महीने में मनाया जाता है।

31 :.सैचू मेला (Saichu Mela )

यह मेला मंडी जिले का राज्य स्तरीय मेला है। यह मेला मंडी जिले के रिवालसर झील के किनारे में मनाया जाता है। हर साल 13 अप्रैल को इस मेले को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह मेला सभी धर्म हिन्दू, सिख,और बौद्ध धर्म के लिए महत्वपूर्ण है आस्था का प्रतीक है और बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

32 : मंडी का शिवरात्रि मेला (Shivratri Fair of Mandi District )

हिमाचल प्रदेश के सभी मेलों में मंडी जिले का शिवरात्रि का मेला पुरे भारत में प्रसिद्ध है। यह मेला मंडी जिले का ये मेला राष्ट्रीय स्तर का है। यह त्यौहार मंडी जिले में शिवरात्रि वाले दिन मनाया जाता है और बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। मंडी जले का यह मेला बहुत मेला पुराना और हिमाचल के मेलों में अपनी छवि के लिए जाना जाता है । मंडी में यह मेला मंडी जिले के पड्डल मैदान में मनाया जाता है। इसे मंडी के राजा अकबर सेन ने 1527 ई में शुरू करवाया था।

33: . दियोट सिद्ध मेला (Deot Sidh Mela )

हिमाचल प्रदेश में यह मेला हमीरपुर जिले में ही मनाया जाता है। इस मेले का आयोजन हर साल मार्च अप्रैल में होता है।

34 : गसोता मेला (Gasota Mela )
यह मेला हमीरपुर जिले में हर साल अप्रैल महीने में मनाया जाता है।

35 :  हमीर उत्सव (Hamir Utsav )

हमीर उत्सव हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में मनाया जाता है। यह मेला हर साल सितम्बर महीने में मनाया जाता है। यह मेला Sujan पुर तिहरा में मनाया जाता है जी की स्थापना राजा संसार चंद ने की थी।

36 : हमीरपुर का होली मेला (Holi का त्यौहार )

हमीरपुर का होली का त्योहार पुरे भारत में प्रसिद्ध है हम सभी जानते हैं की होली रंगों का त्योहार माना जाता है। यह मेला हर साल मार्च में मनाया जाता है। पर हिमाचल प्रदेश में इसका अपना स्थान है।

37: डल मेला (Dal Mela)

हिमाचल प्रदेश में यह मेला काँगड़ा जिले में मनाया जाता है। इस मेले का आयोजन हर साल अगस्त में होता है।

38 : ज्वालामुखी मेला (Jwalamukhi Mela)

हिमाचल प्रदेश में यह मेला काँगड़ा जिले में हर साल नवरात्रों के दिन में जवालामुखी मंदिर में लगता है।

39 : कालेश्वर मेला (Kaleshwar Fair )

यह मेला भी काँगड़ा जिले में लगता है और हर साल अप्रैल महीने के वैशाखी वाले दिन लगता है। यह एक राज्य स्तरीय मेला है।

40 :  फुलेच उत्स्व (Fultech Utsav )

यह मेला हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में मनाया जाता है। इसके नाम से ही पता चलता है की फुलेच का अर्थ होता है फूल और इसलिए इसे फुलैच मेला कहा जाता है। यह हर साल सितम्बर में मनाया जाता है।

41: गोची मेला (Gochi Mela )

यह मेला हिमाचल के कलाँग नामक स्थान में मनाया जाता है। यह लाहौल स्पीति जिले का एक जिला स्तर का मेला है। केलांग लाहौल स्पीति में है। इसे हर वर्ष फरवरी महीने में मनाया जाता है।

42: हालवा मेला (Halda Mela )

यह मेला हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति जिले दो घाटियों में चंद्र और भागा में मनाया जाता है। यह मेला दिसंबर जनवरी मैं हर साल मनाया जाता है। इस मेले को वहां के लोगों द्वारा दिवाली के पर्व की तरह मनाया जाता है।

43 : लोसर उत्स्व (Losar Utsav )

हिमाचल प्रदेश में यह मेला दोनों जिलों ज़िला किन्नौर और लाहौल स्पीति में मनाया जाता है। यह एक का राज्य स्तरीय मेला है। इसका संबंध तिब्बत के नव वर्ष से है इसलिए यह मेला जनवरी के अंतिम सप्ताह में मनाया जाता है।

44: लदारचा मेला

यह मेला हिमाचल प्रदेश के ल्होल स्पीति के काजा नामक स्थान पर मनाया जाता है। यह मेला लोगों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा हुआ है।.यह मेला वहां के लोगो द्वारा जुलाई महीने में हरसाल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

हिमाचल के प्रमुख मेलों-त्योहारों का महीना-वार कैलेंडर और सूची 

महीनाप्रमुख मेले/त्योहारस्थान
जनवरीलोहड़ी, मनाली विंटर कार्निवलविभिन्न क्षेत्र, मनाली
फरवरीमंडी शिवरात्रि, बैजनाथ शिवरात्रिमंडी, बैजनाथ
मार्चनलवाड़ी, होली, नवरात्रिबिलासपुर, सुजानपुर, शक्तिपीठ
अप्रैलबैसाखी, सुही मेला, देवसिद्ध मेलाविभिन्न क्षेत्र
मईकुल्लू स्प्रिंग फेस्टिवल, धुंगरी मेलाकुल्लू, मनाली
जूनशिमला समर फेस्टिवलशिमला
जुलाईमिंजर मेलाचंबा
अगस्तमिंजर, मणिमहेश यात्रा, श्रावण मेलाचंबा, बिलासपुर
सितंबरफुलैच, मणिमहेश यात्राकिन्नौर, चंबा
अक्टूबरकुल्लू दशहराकुल्लू
नवंबरलवी मेला, रेणुका मेलारामपुर, सिरमौर
दिसंबरक्रिसमस व शीतकालीन स्थानीय उत्सवशिमला, मनाली व अन्य क्षेत्र






निष्कर्ष : हिमाचल प्रदेश के मेले और त्योहार यहां की देव संस्कृति, धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन का जीवंत प्रतिबिंब हैं। कुल्लू दशहरा में सैकड़ों देवी-देवताओं का एकत्र होना, मंडी शिवरात्रि में देव संस्कृति की भव्य झलक, चंबा के मिंजर मेले की ऐतिहासिक परंपरा और रेणुका जी मेले की धार्मिक मान्यताएं हिमाचल की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। 

ये मेले केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि लोकगीत, नृत्य, पारंपरिक कला, स्थानीय व्यापार और सामुदायिक मेल-जोल को भी बढ़ावा देते हैं। इसलिए हिमाचल प्रदेश के मेले और त्योहार राज्य की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



Rakesh Kumar

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