हिमाचल प्रदेश में 1857 के विद्रोह के समय स्थानीय शासक और विरोध करने वाले व्यक्ति

हिमाचल प्रदेश में 1857 के विद्रोह के समय स्थानीय शासक और विरोध करने वाले व्यक्ति

प्रस्तावना

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसकी शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई और धीरे-धीरे इसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित किया। वर्तमान हिमाचल प्रदेश का पहाड़ी क्षेत्र भी इस विद्रोह से अछूता नहीं रहा था।

उस समय हिमाचल प्रदेश आज की तरह एक संगठित राज्य नहीं था। इसका अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र अनेक छोटी-बड़ी रियासतों में विभाजित था। इनमें बुशहर, चंबा, बिलासपुर, बघाट, बघाल, धामी, केओंथल, सिरमौर, कुल्लू और अन्य रियासतें शामिल थीं। कुछ स्थानीय शासकों ने अंग्रेजों का सहयोग किया, जबकि कुछ ने अंग्रेजी सत्ता के आदेशों का विरोध किया। दूसरी ओर, कुछ सैनिकों और स्थानीय व्यक्तियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास किया।

इस लेख में हम 1857 के विद्रोह के दौरान हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी रियासतों के प्रमुख शासकों, अंग्रेजों का विरोध करने वाले व्यक्तियों तथा अंग्रेजों की सहायता करने वाले स्थानीय नेताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

1. 1857 के विद्रोह के समय बुशहर रियासत के राजा शमशेर सिंह

हिमाचल प्रदेश की रियासतों में बुशहर (Bushahr) का नाम 1857 के विद्रोह के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है।

बुशहर के राजा शमशेर सिंह उन चुनिंदा पहाड़ी शासकों में शामिल थे जिन्होंने विद्रोह के समय अंग्रेजों के प्रति विरोधात्मक रवैया अपनाया था।

उनके विरोध के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

  • उन्होंने अंग्रेजों को दिया जाने वाला निर्धारित खिराज (Tribute) रोक दिया था।
  • अंग्रेज अधिकारियों को अपने क्षेत्र से गुजरते समय अपेक्षित सहयोग नहीं दिया।
  • अंग्रेज अधिकारियों के साथ उनका व्यवहार असहयोगपूर्ण था।
  • उन्होंने विद्रोह के दौरान अंग्रेजी प्रशासन को सामान्य सहायता और रसद उपलब्ध कराने से परहेज किया।

शिमला के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर लॉर्ड विलियम हे ने राजा के इस व्यवहार के कारण बुशहर में सैनिक कार्रवाई करने तथा रियासत को सीधे अंग्रेजी प्रशासन के अधीन लेने का सुझाव दिया था। लेकिन सैनिकों की उपलब्धता न होने के कारण ऐसी कार्रवाई नहीं हो सकी।

बाद में पंजाब के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सर जॉन लॉरेंस ने राजा के विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं की।

महत्वपूर्ण तथ्य: राजा शमशेर सिंह ने अंग्रेजों का विरोध किया था, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों से यह निश्चित नहीं होता कि उन्होंने विद्रोहियों को प्रत्यक्ष सैन्य सहायता भी दी थी।

2. कुल्लू के प्रताप सिंह और वीर सिंह

1857 के विद्रोह के दौरान कुल्लू क्षेत्र में भी अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का प्रयास हुआ था।

इस घटना में प्रताप सिंह नामक व्यक्ति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने स्वयं को कुल्लू रियासत का वास्तविक अथवा वैध राजा बताकर लोगों को अपने पक्ष में संगठित करने का प्रयास किया।

उसने लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि पंजाब और हिंदुस्तान में अंग्रेजों की शक्ति समाप्त हो चुकी है। इसके माध्यम से उसने लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित किया।

इस विद्रोह से जुड़े प्रमुख व्यक्ति थे:

प्रताप सिंह

  • उसने स्वयं को कुल्लू का वास्तविक राजा घोषित किया था।
  • उसने जून 1857 में लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया।
  • अंग्रेजी प्रशासन ने उसके प्रयास को शीघ्र ही दबा दिया।

वीर सिंह (Bir Singh)

  • वह प्रताप सिंह का निकट सहयोगी और प्रमुख सलाहकार था।
  • उसने विद्रोह की गतिविधियों में प्रताप सिंह का साथ दिया।

अंग्रेजों ने प्रताप सिंह, वीर सिंह और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया। मुकदमे के बाद प्रताप सिंह और वीर सिंह को मृत्युदंड दिया गया।

इस प्रकार कुल्लू में 1857 के विद्रोह का एक महत्वपूर्ण प्रयास अंग्रेजों द्वारा कुचल दिया गया।

3. कसौली और जुतोग में सैनिक विद्रोह

1857 के विद्रोह के दौरान वर्तमान हिमाचल प्रदेश के सोलन और शिमला क्षेत्रों में स्थित ब्रिटिश सैनिक छावनियों में भी असंतोष फैल गया था।

  • कसौली, जुतोग, डगशाई और सबाथू उस समय अंग्रेजों के महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र थे।
  • कसौली और जुतोग की घटनाओं में गोरखा सैनिकों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय थी।

कसौली में सैनिकों का विरोध

कसौली में तैनात भारतीय सैनिकों में अंग्रेजी अधिकारियों के प्रति असंतोष बढ़ रहा था। वेतन, सैनिकों के परिवारों की देखभाल और अन्य सेवा संबंधी समस्याओं को इस असंतोष के कारणों में शामिल किया जाता है।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की इतिहास सामग्री में कसौली में सुबेदार भीम सिंह के नेतृत्व में सैनिकों के विद्रोह का उल्लेख मिलता है।

जुतोग में विद्रोही सैनिक

  • जुतोग (Jutogh), जो वर्तमान शिमला क्षेत्र में स्थित है, उस समय अंग्रेजों की महत्वपूर्ण सैनिक छावनी थी।
  • यहाँ नासिरी बटालियन (Nasiri Battalion) के सैनिक तैनात थे। इस बटालियन में बड़ी संख्या में गोरखा सैनिक शामिल थे।
  • कसौली के लगभग 80 सैनिक सरकारी खजाने की धनराशि लेकर जुतोग की ओर बढ़े और वहाँ के असंतुष्ट सैनिकों के साथ मिल गए।
  • इस घटनाक्रम से शिमला में रहने वाले अंग्रेज अधिकारियों और यूरोपीय नागरिकों में भय का वातावरण पैदा हो गया था।
  • हालाँकि यह सैनिक विद्रोह अधिक समय तक सफल नहीं रहा और अंग्रेजों ने इसे दबा दिया।

विशेष बात: इन सैनिकों की कार्रवाई के पीछे देशभक्ति, वेतन संबंधी असंतोष और सैनिकों की परिस्थितियों जैसे कारणों की भूमिका को लेकर इतिहासकारों में चर्चा रही है।

4. सुबेदार भीम सिंह और सुबेदार राम सिंह का उल्लेख

1857 के विद्रोह के संदर्भ में कसौली और जुतोग की सैनिक गतिविधियों के साथ सुबेदार भीम सिंह तथा सुबेदार राम सिंह के नाम भी मिलते हैं।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री में सुबेदार भीम सिंह को कसौली में सैनिकों के विद्रोह से जोड़ा गया है। इसी विवरण में सुबेदार राम सिंह को मृत्युदंड सुनाए जाने और बाद में भागकर बुशहर पहुँचने का उल्लेख भी मिलता है।

इस विषय में अलग-अलग विवरणों में नामों और घटनाओं का वर्णन एक समान नहीं मिलता। इसलिए दोनों नामों को बिना पर्याप्त प्रमाण के एक ही व्यक्ति मानना उचित नहीं होगा।

5. राम प्रसाद वैरागी

1857 के विद्रोह के समय सुबाथू क्षेत्र से जुड़े राम प्रसाद नामक एक वैरागी का भी उल्लेख मिलता है।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार उन पर कुछ राजद्रोहात्मक पत्र लिखने का आरोप लगाया गया था।

उन्हें गिरफ्तार करके अंबाला ले जाया गया और वहाँ मृत्युदंड दिया गया।

इस घटना से पता चलता है कि अंग्रेजी प्रशासन केवल सैनिक विद्रोह ही नहीं, बल्कि विद्रोह से संबंधित माने जाने वाले संदेशों और गतिविधियों पर भी कड़ी निगरानी रखता था।

6. अंग्रेजों का सहयोग करने वाले हिमाचल के स्थानीय शासक

1857 के विद्रोह में हिमाचल की अधिकतर पहाड़ी रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया अथवा विद्रोह से दूरी बनाए रखी।

हिमाचल प्रदेश सरकार के आधिकारिक इतिहास विवरण में चंबा, बिलासपुर, बघाल और धामी के शासकों को अंग्रेजों की सहायता करने वाली रियासतों में शामिल किया गया है।

इनके अतिरिक्त शिमला पहाड़ी क्षेत्र की कई अन्य रियासतों ने भी अंग्रेजों की सहायता की।

(क) राजा संसार सेन – केओंथल रियासत

केओंथल रियासत के शासक संसार सेन ने विद्रोह के समय अंग्रेजों की सहायता की थी।

जब शिमला में विद्रोही सैनिकों के आने की आशंका से अंग्रेजों में भय फैल गया, तब संसार सेन ने अंग्रेज अधिकारियों और यूरोपीय नागरिकों को शिमला तथा जूंगा स्थित अपने महलों में शरण दी।

इस सहायता ने अंग्रेजों को उस संकट के समय सुरक्षा प्रदान की।

(ख) राजा श्री सिंह – चंबा रियासत

1857 के समय चंबा के शासक राजा श्री सिंह थे।

उन्होंने अंग्रेजों को सैनिक सहायता प्रदान की। चंबा के सैनिकों को मियां अवतार सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों की सहायता के लिए भेजे जाने का उल्लेख मिलता है।

चंबा के राजा ने डलहौजी के सैनिटोरियम में अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को भी सुरक्षा प्रदान की थी।

(ग) राजा हीरा चंद – बिलासपुर रियासत

बिलासपुर के राजा हीरा चंद ने भी अंग्रेजों का सहयोग किया था।

बिलासपुर के लगभग 50 सशस्त्र सैनिकों को शिमला के बोइलॉगंज क्षेत्र में तैनात किया गया था। बाद में अंग्रेजों ने उनकी सेवाओं के लिए राजा को सम्मानित भी किया।

(घ) राणा किशन सिंह – बघाल रियासत

बघाल रियासत के राणा किशन सिंह ने भी अंग्रेजों को सहायता प्रदान की थी।

इस रियासत के सैनिकों ने शिमला क्षेत्र में अंग्रेजी प्रशासन को सहयोग दिया।

(ङ) राजा गोवर्धन सिंह – धामी रियासत

धामी के शासक राजा गोवर्धन सिंह ने भी अंग्रेजों का साथ दिया था।

विद्रोह के बाद अंग्रेज सरकार ने उनकी सेवाओं के बदले जीवनभर के लिए निर्धारित खिराज का आधा भाग माफ कर दिया था।

(च) अन्य स्थानीय शासक

1857 के विद्रोह के दौरान निम्नलिखित रियासतों के शासकों अथवा स्थानीय नेताओं ने भी अंग्रेजों की सहायता की थी:

  • कोटी रियासत
  • बलसन रियासत
  • भज्जी रियासत
  • जुब्बल रियासत
  • सिरमौर रियासत

इन रियासतों के सैनिकों और स्थानीय नेताओं ने शिमला तथा आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी प्रशासन को सहयोग दिया।

7. मियां जय सिंह – बघाल रियासत

मियां जय सिंह बघाल रियासत के राणा के भाई थे। 1857 के विद्रोह के दौरान नालागढ़ के निकट मालौन क्षेत्र में हथियारों से संबंधित एक घटना हुई थी।

मालौन के कुछ लोगों ने शस्त्रागार के हथियारों को अपने कब्जे में ले लिया और उन्हें आगे ले जाने से रोक दिया।

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए शिमला के डिप्टी कमिश्नर लॉर्ड विलियम हे ने मियां जय सिंह को वहाँ भेजा।

मियां जय सिंह की सहायता से उस क्षेत्र में व्यवस्था बहाल की गई।

इस प्रकार मियां जय सिंह ने विद्रोह के दौरान अंग्रेजी प्रशासन की सहायता की थी।

8. सिरमौर रियासत और अन्य पहाड़ी सैनिकों का सहयोग

सिरमौर रियासत ने भी 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों को सैनिक सहायता प्रदान की थी।

सिरमौर के लगभग 60 सैनिकों को कुंवर बीर सिंह के नेतृत्व में शिमला के बड़ा बाजार क्षेत्र में तैनात किया गया था। कुंवर बीर सिंह सिरमौर के राजा के चाचा बताए गए हैं।

इसके अतिरिक्त, केओंथल, धामी और भज्जी की रियासतों के लगभग 60 सैनिकों को भी अंग्रेजी अधिकारियों के निवास के आसपास तैनात किया गया था।

इन सैनिकों का उद्देश्य शिमला में अंग्रेजों की सुरक्षा करना तथा विद्रोही सैनिकों की गतिविधियों पर नियंत्रण रखने में सहायता देना था।

9. 1857 के विद्रोह में हिमाचल के प्रमुख शासक और विरोध करने वाले व्यक्ति : एक नजर में

नामरियासत/क्षेत्र1857 में भूमिका
राजा शमशेर सिंहबुशहरअंग्रेजों का विरोध, खिराज रोकना
प्रताप सिंहकुल्लूअंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का प्रयास
वीर सिंहकुल्लूप्रताप सिंह का प्रमुख सहयोगी
सुबेदार भीम सिंहकसौलीसैनिक विद्रोह में भूमिका
सुबेदार राम सिंहसैनिक विद्रोहमृत्युदंड सुनाए जाने और भागने का उल्लेख
राम प्रसाद वैरागीसुबाथूराजद्रोहात्मक पत्रों के आरोप में गिरफ्तार और मृत्युदंड
राजा संसार सेनकेओंथलअंग्रेजों को शरण और सहायता
राजा श्री सिंहचंबाअंग्रेजों को सैनिक सहायता
राजा हीरा चंदबिलासपुरसैनिक सहायता
राणा किशन सिंहबघालअंग्रेजों को सहयोग
राजा गोवर्धन सिंहधामीअंग्रेजों को सहयोग
मियां जय सिंहबघालनालागढ़ क्षेत्र में व्यवस्था बहाल करने में सहायता
कुंवर बीर सिंहसिरमौरअंग्रेजों की सहायता में सैनिक तैनाती

नोट: कुछ व्यक्तियों के नामों और घटनाओं के विवरण में ऐतिहासिक स्रोतों के बीच अंतर मिलता है। विशेषकर सैनिक विद्रोह में भीम सिंह और राम सिंह के प्रसंग को अलग-अलग प्रमाणों के आधार पर समझना चाहिए।

10. 1857 के विद्रोह का हिमाचल प्रदेश पर प्रभाव

1857 का विद्रोह हिमाचल की पहाड़ी रियासतों में मैदानी क्षेत्रों जैसी व्यापक जनक्रांति का रूप नहीं ले सका। फिर भी इसका प्रभाव कई स्थानों पर दिखाई दिया।

इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित थे:

  1. बुशहर रियासत के शासक ने अंग्रेजों के प्रति असहयोग का रवैया अपनाया।
  2. कुल्लू में प्रताप सिंह और वीर सिंह ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का प्रयास किया।
  3. कसौली और जुतोग की सैनिक छावनियों में विद्रोही गतिविधियाँ हुईं।
  4. अंग्रेजों ने शिमला तथा आसपास की रियासतों में अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की।
  5. अंग्रेजों का सहयोग करने वाले पहाड़ी शासकों को विद्रोह के बाद सम्मान और पुरस्कार दिए गए।
  6. 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया।

निष्कर्ष

1857 के विद्रोह में हिमाचल प्रदेश की भूमिका मिश्रित रही। जहाँ बुशहर के राजा शमशेर सिंह ने अंग्रेजी सत्ता के प्रति असहयोग का रास्ता अपनाया, वहीं कुल्लू के प्रताप सिंह और वीर सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास किया। कसौली और जुतोग में सैनिकों ने भी अंग्रेजी शासन को चुनौती दी।

दूसरी ओर, चंबा, बिलासपुर, केओंथल, बघाल, धामी और सिरमौर जैसी रियासतों के शासकों अथवा सैनिकों ने अंग्रेजों को सहायता प्रदान की।

इसलिए 1857 के विद्रोह के इतिहास में हिमाचल प्रदेश को केवल अंग्रेजों का सहयोग करने वाला क्षेत्र मानना सही नहीं होगा। यहाँ अंग्रेजों का विरोध, सैनिक असंतोष और स्थानीय शासकों की अलग-अलग राजनीतिक नीतियाँ एक साथ दिखाई देती हैं।

Rakesh Kumar

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