चंबा का इतिहास : रियासत से लेकर सियासत तक | Chamba History in Hindi

परिचय

हिमाचल प्रदेश का चंबा जिला अपने गौरवशाली इतिहास, प्राचीन राजवंशों, धार्मिक परंपराओं, कला-संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। रावी नदी की घाटी में बसा चंबा हिमालय के उन क्षेत्रों में शामिल है, जहां इतिहास की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं और परंपराओं के प्रमाण आज भी देखने को मिलते हैं। प्राचीन मंदिर, ऐतिहासिक भवन, शिल्पकला और लोक परंपराएं चंबा के समृद्ध अतीत की कहानी कहती हैं।

चंबा के इतिहास की शुरुआत प्राचीन ब्रह्मपुर से जुड़ी मानी जाती है। बाद में राजा मरु ने चंबा राज्य की नींव रखी और समय के साथ विभिन्न राजाओं के शासन में यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण पहाड़ी रियासत के रूप में विकसित हुआ। राजा साहिल वर्मन के शासनकाल में चंबा नगर की स्थापना से इस क्षेत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ा। चंबा के राजाओं ने मंदिर निर्माण, कला, शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक चंबा ने अनेक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों को देखा। चंबा रियासत का 15 अप्रैल 1948 को भारतीय संघ में विलय हुआ और यह हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बनी। इसके बाद चंबा ने राजशाही से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया। 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद चंबा आधुनिक हिमाचल प्रदेश के एक महत्वपूर्ण जिले के रूप में स्थापित हुआ।

चंबा का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों तक सीमित नहीं है। चंबा रूमाल, पहाड़ी चित्रकला, प्राचीन मंदिर, मिंजर मेला, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और समृद्ध लोक संस्कृति इस इतिहास को जीवंत बनाती हैं। यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी स्थानीय जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

इस लेख में GK Pustak के माध्यम से हम चंबा जिले के इतिहास को प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक क्रमबद्ध रूप से समझेंगे। इसमें चंबा की स्थापना, प्रमुख राजाओं, महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं, ब्रिटिश काल, रियासत के विलय तथा स्वतंत्र भारत में चंबा के विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह लेख हिमाचल प्रदेश सामान्य ज्ञान और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी रहेगा।

चंबा का इतिहास : रियासत से लेकर सियासत तक | Chamba History in Hindi


चंबा जिले का इतिहास | Chamba History in Hindi

1. हिमाचल प्रदेश के चंबा  जिले का परिचय : चंबा जिला हिमाचल प्रदेश का हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों में से पुराना जिला है। यह पहले पहाड़ी रियासत थी। 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश के गठन के समय इस जिले का निर्माण हुआ था। इसलिए 15 अप्रैल को चंबा जिले का स्थापना दिवस और हिमाचल प्रदेश का स्थापना दिवस दोनों के रूप में मनाया जाता है। 

जब चंबा जिले का निर्माण हुआ तब इसके साथ तीन और जिले हिमाचल प्रदेश के बने थे वे थे सिरमौर,महासू, मंडी। यह एक पहाड़ी जिला है। इसके इर्द-गिर्द हिमाचल के दो जिले हैं: एक लाहौल-स्पीति और दूसरा काँगड़ा जिला। चंबा जिले के साथ अन्य राज्यों की जो Boundaries लगती हैं वह हैं जम्मू-कश्मीर और पंजाब। 

चंबा भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य का एक शहर है। हिमाचल प्रदेश में चंबा अपने आकर्षक मंदिरों और हस्तशिल्प के लिए जाना जाता है। रावी नदी के तट पर 996 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चंबा, पहाड़ियों के राजाओं की प्राचीन राजधानी थी।

2. चंबा जिले का नामकरण:

चंबा जिले का नामकरण कैसे हुआ या फिर चंबा का चंबा नाम कैसे पड़ा? 920 ईस्वी में चंबा रियासत की स्थापना की गई थी और इस रियासत की राजधानी ब्रह्मपुरा थी जो आज भरमौर के नाम से जाना जाता है। 920 ईस्वी की बात है जब साहिल वर्मन और उनकी बेटी चम्पावती ब्रह्मपुरा के लिए वापिस जा रहे थे तो चंबावती ने चंबा शहर के आकर्षण को देखते हुए यहां पर रहने के लिए राजा मरू वर्मन को वाद्य किया इस जिद से वे वहां पर रह गए उसी दिन से चंबा का नाम मरू वर्मन की बेटी चम्पावती के नाम से चंबा पड़ गया।

3.  चंबा शहर की स्थापना: 

चंबा शहर की स्थापना और चंबा रियासत की स्थापना दोनों में अंतर है और सवाल पूछे भी जाते हैं इसमें हम आपको बता दें ,चंबा रियासत की स्थापना मरू वर्मन ने की थी पर चंबा शहर साहिल वर्मन ने बसाया था। नाम तो मेरु  वर्मन ने रखा पर शहर की स्थापना साहिल वर्मन ने हिमाचल प्रदेश की जो भी परीक्षायें होती हैं उसमे पहाड़ी राजाओं से भी सवाल पूछे जाते हैं इसलिए जानते हैं चंबा जिले के पहाड़ी राजाओं का इतिहास जो रोचक भी है परीक्षा की दृष्टि से जरूरी भी है। 

चंबा जिले का प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास:

1. चंबा का प्राचीन इतिहास:

चंबा, हिमाचल प्रदेश, भारत का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है और इसका प्राचीन इतिहास बहुत ही रोचक है। चंबा नगर और उसके आसपास क्षेत्र में कई पुरातात्विक धरोहरों के अवशेष मिले हैं जो इसके प्राचीन इतिहास की प्रमुख स्रोत होते हैं।

चंबा राजवंश: चंबा का इतिहास चंबा राजवंश से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने इस इलाके को लगभग 14वीं सदी से 19वीं सदी तक शासन किया। यह राजवंश नाग वंश से संबंधित माना जाता है और इसका इतिहास रजाओं के प्रतिशोध, युद्ध, और सांस्कृतिक विकास के साथ जुड़ा हुआ है।

चंबा के मंदिर: चंबा नगर में कई प्राचीन हिन्दू मंदिर हैं, जैसे कि चमुंदा देवी मंदिर, ब्रजेश्वरी मंदिर, और बारा पथर मंदिर, जो इस इलाके के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल हैं। इन मंदिरों का निर्माण प्राचीन काल में हुआ था और वे अर्थ, संस्कृति, और समाज के प्रतिस्थापक के रूप में महत्वपूर्ण हैं।

चंबा का संस्कृति और कला: चंबा का संस्कृति और कला भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण हिस्से को प्रकट करता है। यहां की प्राचीन चित्रकला, और स्थानीय गीत, नृत्य और कविता इस इलाके की विशेषता हैं।

बुध धर्म: चंबा में बौद्ध धर्म का प्रचलन भी रहा है और यहां के बौद्ध मठ और विहार इसके साक्षी रहे हैं।

चंबा के इतिहास में समर्थ राजा: चंबा के इतिहास में कई समर्थ और महान राजा रहे हैं, जैसे कि राजा साहिल वर्मन, जिन्होंने इस क्षेत्र को अपने शासनकाल में विकसित किया। चंबा का प्राचीन इतिहास इस क्षेत्र की धर्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है और यह एक रोचक और महत्वपूर्ण विषय है। यदि आप इसके अधिक विवरण चाहते हैं, तो स्थानीय पुरातात्विक अनुसंधान और इतिहास ग्रंथों का सहायता लेने की सलाह दी जा सकती है।

2. चंबा का मध्यकालीन इतिहास :

चंबा भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य का एक प्रमुख जिला है और इसका मध्यकालीन इतिहास भी दिल्ली सुल्तानात और मुघल साम्राज्य के साथ जुड़ा हुआ है। चंबा का इतिहास इस प्रकार है:

गुप्त साम्राज्य काल (4वीं से 6वीं सदी ईसा): गुप्त साम्राज्य काल के दौरान, चंबा एक छोटे से गौरवशाली राज्य के रूप में मौजूद था। इस समय यह भूमिगत और धार्मिक केंद्र था।

दिल्ली सुल्तानात काल (13वीं से 16वीं सदी तक): चंबा दिल्ली सुल्तानात के अधीन आया और सुल्तानों के शासन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान, इसके राजा अपनी स्वतंत्रता की सद्गति प्राप्त करने के लिए उनकी सेवाओं को प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते थे।

मुघल साम्राज्य काल (17वीं से 19वीं सदी तक): मुघल सम्राटों के शासन के दौरान, चंबा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा और साम्राज्य के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र बन गया।

ब्रिटिश साम्राज्य काल (19वीं सदी के आस-पास): चंबा ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आया और ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कई साल तक रहा।

स्वतंत्रता संग्राम (20वीं सदी की शुरुआत): चंबा भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उद्घाटन कार्यक्रमों का हिस्सा बना।

इसके बाद, 1947 में भारत की आजादी के बाद, चंबा हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बना और आज भी यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इलाका है।

Note:- कृपया ध्यान दें कि यह एक सारांश है और अधिक विस्तारित इतिहास के लिए और अधिक जानकारी के लिए स्थानीय पुस्तकों और संसाधनों का सहारा लिया जा सकता है।

3. चंबा का आधुनिक इतिहास:

चंबा, हिमाचल प्रदेश, भारत का एक प्रमुख शहर है जिसका इतिहास काफी पुराना है। चंबा का आधुनिक इतिहास निम्नलिखित तरीके से विकसित है:

प्राचीन काल: चंबा का ऐतिहासिक उल्लेख महाभारत काल में भी मिलता है, और कहा जाता है कि यह शहर महाभारत के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था। चंबा क्षेत्र के पास स्थित ब्रह्मगौरी तापु, जो महाभारत में उल्लिखित है, एक प्रमुख धार्मिक स्थल भी है।

गुप्त साम्राज्य का काल: चंबा का इतिहास गुप्त साम्राज्य के समय भी महत्वपूर्ण था। इस काल में चंबा एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और धार्मिक केंद्र था।

राजपूत शासकों का शासन: चंबा क्षेत्र में राजपूत शासकों का शासन था, और यह शहर उनके शासकीय सत्ता का मुख्य केंद्र था।

सिक्किम साम्राज्य काल: चंबा क्षेत्र ने सिक्किम साम्राज्य के शासकों का समर्थन किया और इसका हिस्सा बन गया।

ब्रिटिश शासन काल: 19वीं सदी में, चंबा क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आया।

स्वतंत्रता संग्राम: चंबा क्षेत्र ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण योगदान दिया और स्वतंत्रता संग्राम के समय इसके नागरिकों ने विभाजन और असहमति के बावजूद स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।

हिमाचल प्रदेश का हिस्सा: भारत की स्वतंत्रता के बाद, चंबा हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बना और यहाँ पर स्थानीय सरकारों द्वारा प्रशासित होता है।

चंबा का आधुनिक इतिहास इसके विविध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को प्रकट करता है और यह एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी है जिसे भारत और विदेशी पर्यटक दोनों ही आकर्षित होते हैं।

चंबा राजवंश के राजाओं का इतिहास  :

1. मेरु वर्मन 680 ईस्वी से: 

मेरु वर्मन उस वक्त की राजधानी जो भरमौर थी उसका सबसे शक्तिशाली राजा था। उसकी कुल्लू के राजा के साथ एक बार लड़ाई हुई जिसमे उसने कुल्लू के राजा को हराया था। मेरु वर्मन ने चंबा रियासत में मंदिर निर्माण में भी अपनी भूमिका निभाई।

अब प्रश्न ये है की की मेरु वर्मन ने चंबा में किन किन मदिरों का नर्माण करवाया वे थे भरमौर में छतराड़ी में माँ शक्ति मंदिर निर्माण, भरमौर में 84 मंदिर, गणेश मंदिर, चंबा में नरसिम्हा मंदिर आदि।

2. मूंसांवर्मन 820 ईस्वी

मूंसां वर्मन के पीछे इतिहास रोचक है मूंसां वर्मन के पिता लक्ष्मी वर्मन की युद्ध में मृत्यु हो गई। उस वक्त मूंसां वर्मन छोटा था उस बच्चे की जान बचाने के लिए उसकी माँ वहां से मूंसां वर्मन को लेकर भाग गई वः उसकी जान बचाना चाहती थी।

रानी ने मूंसां वर्मन की जान बचाने के लिए उसको एक गुफा में छिपा दिया। जब कुछ दिनों बाद रानी उस गुफा में लौटीं तो उस बच्चे की रक्षा करते हुए कई चूहों को देखा गया। चूहे को मूसा कहा जाता है इसलिए उसका नाम "मूंसां वर्मन" रखा गया।

3. साहिल वर्मन 920 ईस्वी

साहिल वर्मन ने ही चंबा शहर की स्थापना की थी। राजा साहिल वर्मन के दस बेटे और एक बेटी थे। बेटी का नाम चंपावती था। एक बार भरमौर अपनी राजधानी को लौटते उसकी बेटी ने एक स्थान जो अभी का चंबा है पर रोकने की जिद्द की। वे वहाँ पर रूक गए।

साहिल वर्मन अपनी लड़की के साथ बहुत प्यार करता था लड़की चम्पावती ने वहां पर जब शहर बसने की जिद्द की तो साहिल वर्मन ने चंबा शहर की स्थापना की और इस शहर का नाम चम्पावती के नाम से ही रखा गया जिसे आज "चम्बा" के नाम जाना जाता है। ये 920 ईस्वी की बात है।

युगांकर वर्मन 940 ई०

साहिल वर्मन के बाद चंबा में युगांकार वर्मन ने राज किया। उनकी पत्नी का नाम रेखा देवी था। उन्होंने भरमौर में नरसिंघ मंदिर का निर्माण करवाया था। उन्होंने भरमौर में विकास कार्य किये उन्होंने भरमौर में स्थपित गोरी देवी मंदिर का निर्माण भी करवाया था।

4. सलवाहन बर्मन 1040 ईस्वी

युगांकार वर्मन के बाद चंबा के राजा सलवाहन वर्मन थे इतिहास का प्रमुख स्त्रोत राजतरंगनी के अनुसार कश्मीर का जो राजा था जिसका नाम अनतदेव देव था ने भरमौर पर आक्रमण किया था। पूर्ण शिलालेखों से पता चलता है कि उस समय उनके पास तीसा परगना, और साही कोठी परगना प्रमुख थे।

5. जसाटावर्मन 1105 ईस्वी

जसाटावर्मन ने 1105 ईस्वी से चंबा पर राज किया। उसने अपने रिश्तेदारों के खिलाफ कश्मीर के राजा का समर्थन किया था। उस वक्त कश्मीर का राजा सुशला वर्मन था। अगर चंबा के इतिहास की बात करें तो उस वक्त जसाटावर्मन के शिलालेख चुराह तहसील में आज भी विराजमान हैं।

6. उदय वर्मन - 1120 ईस्वी

उसके बाद उदयवर्मन ने चंबा की रियासत की बागडोर संभाली। उदयवर्मन की दो बेटियां थी एक का नाम देव लेखा और दूसरी का नाम तारलेखा था ,उदयवर्मन ने अपनी दोनों बेटियों की शादी कश्मीर के राजा जिसका नाम सुशला था के साथ किया था पर सुशाला की मृत्यु के बाद इन दोनों को सती होना पड़ा था।

7. ललित वर्मन - 1142 ईस्वी

उसके बाद ललित वर्मन ने चंबा रियासत की बागडोर संभाली। उसने भी चंबा के ऊपर बहुत अच्छा राज किया। आज का पांगी और तिस्सा तहसील उस वक्त उसी के अंदर आते थे ये प्रमाण डिबरी कोठी और सिचुनला में जो दो पुराने शिलालेख मिले हैं उनसे होता है जिसमें ललित वर्मन के समय के पुराने लेख पाए गए हैं।

8. विजयवर्मन 1175 ईस्वी

उसके बाद चंबा रियासत पर विजयवर्मन ने बागडोर संभाली विजय वर्मन मुग़ल शासक मुहम्मद गोरी का समकालीन था इसलिए जब मुहम्मद गोरी ने भारत के कई हिस्सों में आक्रमण किये तो विजयवर्मन ने इन हमलों का फायदा उठाते हुए। कश्मीर और लद्दाख के कई हिस्सों पर आक्रमण कर दिया और गोरी की आड़ में कई हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया।

9. गणेश बर्मन 1512 ईस्वी

चंबा के इतिहास में ये रोचक और बहुत ही याद रखने वाली बात है कि चंबा के राजाओं के साथ जो वर्मन शब्द लगता था उस वर्मन को हटा कर गणेश वर्मन ने चंबा के राज परिवार में "वर्मन" की जगह "सिंह" शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने गणेश मंदिर का निर्माण भी करवाया था।

10. प्रताप सिंह वर्मन 1559 ईस्वी

गणेश वर्मन की मृत्यु हो गई और उसके बाद प्रताप सिंह वर्मन चंबा के राजा बने गणेश वर्मन की मृत्यु 1559 में हुई थी। प्रताप सिंह वर्मन को मुग़ल राजा अकबर का समकालीन माना जाता है। प्रताप सिंह वर्मन भी एक लड़ाका था उसने कई आक्रमण किये काँगड़ा के राजा चंद्रपाल के साथ उसने युद्ध किया और काँगड़ा की रियासत गुलेर को उस वक्त चंबा का हिस्सा बनाया था।

11. बलभद्र 1589 ईस्वी या जनार्दन

बलभदर चंबा के सभी राजाओं में से दानी, दयालु और उदार माना जाता था। चंबा के लोग इसकी तुलना महाभारत के राजा दानवीर कर्ण के साथ करते थे। उनके बेटे का नाम जनार्दन था जो सत्ता के लिए उतुसक था बलभद्र के दानी होने के कारण ही उनके बेटे जनार्दन ने उन्हें सिहासन से हटा दिया था। 

काँगड़ा के राजा जगत सिंह और जनार्दन के बीच युद्ध हुआ और इसमें चंबा के राजा जनार्दन की हार हुई थी। जहांगीर जनार्दन के समकालीन थे और 1622 की बात है जब वे जहांगीर को मिलने भी गए थे अर्थात सहायता लेने गए थे।

12. पृथ्वी सिंह 1641 ईस्वी

उसके बाद चंबा रियासत की बागडोर पृथवी सिंह ने संभाली जगत सिंह मुग़ल राजा शाहजहां के समकालीन थे। जगत सिंह ने 1641 में शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। पृथवी सिंह ने इस मोके का फायदा उठाया और वह मंडी के राजा और सुकेत के राजा की मदद से चंबा के ऊपर कब्ज़ा करने की कोशिश की रोहतांग दर्रे से होते हुए वे चंबा की पांगी और चुराह तहसील में पहुंचे और चंबा पर कब्ज़ा कर लिया।

उस वक्त काँगड़ा की गुलेर रियासत का राजा मानसिंघ चंबा के राजा जगत सिंह का दुश्मन था उसने भी पृथ्वी सिंह की इस कार्य में सहायता की। भलेई परंगना को देकर पृथ्वी सिंह ने बसोली के राजा के साथ गठबंधन कर लिया।

13. चतर सिंह 1464 ईस्वी

उसके बाद चंबा रियासत की बागडोर चतर सिंह ने संभाली और चतरसिंह ने बसोली रियासत पर हमला करके उस पर कब्ज़ा कर लिया था। उस वक्त पुरे भारत में ओरंगजेब का अत्याचार चल रहा था वे ओरंगजेब के ही समकालीन थे औरंगजेब ने जब उन्हें भी चंबा के सभी मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया तो उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया था।

14. उदय सिंह 1690 ईस्वी

अपने चाचा वजीर जय सिंह की मृत्यु के बाद, चतर सिंह के पुत्र राजा उदय सिंह ने अपनी बेटी के साथ प्यार में एक नाई को नियुक्त किया था और उसका नाम चंबा का वज़ीर रखा था।

15. उम्मेद सिंह 1748 ईस्वी

उम्मेद सिंह ने चंबा के राज्य का विस्तार किया उनका राज्य चंबा से लेकर मंडी रियासत की सीमा तक फैला हुआ था। उनको एक पुत्र हुआ जिसका नाम राजसिंघ रखा गया था उनका जन्म चंबा की तहसील राजनगर में हुआ था। उम्मेद सिंह ने राजनगर में 'नाडा महल' का निर्माण कराया। चंबा में जो रंग महल है उसका निर्माण भी राजसिंघ ने ही करवाया था। 

हम सभी जानते हैं की उस वक्त राजा की मृत्यु के बाद रानी सती हो जाती थी पर वे एक ऐसे राजा थे जिन्होंने रानी को अपनी मृत्यु के बाद सती न होने के आदेश दिए थे। उम्मेद सिंह की मृत्यु 1764 ईस्वी में हुई।

16. राज सिंह 1764 ईस्वी

चंबा के इतिहास में ये पहली बार था कि चंबा रियासत में सबसे कम उम्र में राजसिंघ राजा बना जो 9 साल की उम्र में राजा बना था। राजसिंघ ने काँगड़ा के राजा संसार चंद के साथ भी युद्ध किये ये युद्ध संसांर चाँद के साथ रिहलू क्षेत्र में हुआ था ये लड़ाई 1794 ईस्वी में लड़ी गई थी। जब शाहपुर में युद्ध हुआ उसमे राजा राजसिंघ की मृत्यु हो गई। निक्का, रांझा, छज्जू, और हरकू राजसिंह कई अदालतों के कुशल कलाकार थे।

17. जीत सिंह 1794 ईस्वी

जीत सिंह के समय काँगड़ा के राजा और चंबा के राजा का आपस में बहुत dispute था जीत सिंह ने वजीर नाथू को काँगड़ा के राजा संसांर चंद के साथ युद्ध के लिए भेजा। उसके साथ अमर सिंह थापा, महान चंद, युद्ध लड़ने के लिए गए थे।

18. चरहत सिंह 1808 ईस्वी

इसके बाद चंबा का राजा चरहत सिंह बने उन्होंने 6 साल की उम्र में राज संभाला उस समय चंबा का वजीर नाथू था और वः ही शासन संभालता था। चरहत सिंह की माता का नाम शारदा था। शारदा ने १८२५ में चंबा में राधा कृष्णा मंदिर का निर्माण करवाया था। 1825 ईस्वी में पद्दार के राजा ने चंबा पर हमला किया और चंबा को अपना हिस्सा बना लिया या चंबा पर कब्ज़ा कर लिया। चंबा के वज़ीर की मृत्यु 1838 ईस्वी में हुई। चरहत सिंह की मृत्यु 1844 ईस्वी में हुई जब वे 42 साल की उम्र के थे।

19. श्री सिंह 1844 ईस्वी

श्री सिंह चंबा के सिंहासन पर 5 साल की उम्र में विराजमान हुए। उस वक्त चंबा ब्रिटिश शासन काल में आता था। ब्रिटिश ने चंबा रियासत को जम्मू के राजा को दे दिया पर भगा सिंह जो चंबा का वजीर था के प्रयासों से चंबा रियासत को वापस लिया गया।

20. गोपाल सिंह 1870 ईस्वी

श्री सिंह की मृत्यु के बाद चंबा के सिंहासन पर श्री सिंह के भाई गोपाल सिंह जी विराजमान हुए। वे एक ऐसे राजा थे जिन्होंने चंबा रियासत की खूबसूरती के लिए काम किये। उनके कार्यकाल के दौरान भगवान मेयो चंबा 1871 ईस्वी में पहुंचे।

21. शाम सिंह 1873 ईस्वी

शाम सिंह को जनरल रेनल टेलर ने 7 साल की उम्र में राजा बनाया और मियां अवतार सिंह को वजीर बनाया गया। सर हेनरी डेविस ने 1874 में चंबा की यात्रा की। शाम सिंह ने 1875 ई। के दिल्ली दरबार में भाग लिया।

1877 ईस्वी 1878 ईस्वी में, जॉन हैरी को शाम सिंह का गुरु नियुक्त किया गया। 1880 में चंबा हॉप की खेती शुरू हुई। सर चार्ल्स आईटी एरिक्सन ने 1883 ईस्वी में चंबा की यात्रा की।

22. राजा भूरी सिंह 1904 ईसवी

उसके बाद राजा भूरी सिंह चंबा के रियासत के राजा बने। राजा भूरी सिंह ने 1 जनवरी, 1906 को नाइटहुड की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने चंबा में भूरी सिंह संग्रहालय की स्थापना की। जब पहला विश्व युद्ध हुआ तो उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता की। उन्होंने 1910 में साल नदी पर एक बिजलीघर बनाया गया, जिसने चंबा शहर को बिजली प्रदान की। राजा भूरी सिंह की मृत्यु 1919 में हो गई। राजा भूरी सिंह की मृत्यु के बाद टक्कर सिंह चंबा के राजा बने जिन्होंने (1919-1935) तक चंबा पर राज किया।

23. राजा लक्ष्मण सिंह (1935) 

राजा लक्ष्मण सिंह को 1935 में चंबा का अंतिम राजा नियुक्त किया गया था। चंबा रियासत 15 अप्रैल, 1948 को हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बनी।

15 अप्रैल 1948 के बाद चंबा जिले का संक्षिप्त इतिहास

15 अप्रैल 1948 को चंबा रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ और यह हिमाचल प्रदेश के गठन के साथ उसके प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा बन गई। चंबा के तत्कालीन शासक राजा लक्ष्मण सिंह के शासन का भी इसी प्रक्रिया के साथ अंत हुआ और राजशाही व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक प्रशासन की शुरुआत हुई।

1948–1950:

चंबा हिमाचल प्रदेश के प्रारंभिक प्रशासनिक ढांचे में शामिल रहा। रियासतकालीन प्रशासनिक व्यवस्था को धीरे-धीरे आधुनिक शासन प्रणाली में बदला गया। भारत के संविधान के लागू होने के बाद प्रशासन और अधिक संस्थागत रूप से विकसित हुआ।

1950–1956:

इस अवधि में चंबा हिमाचल प्रदेश के Part C State के प्रशासनिक ढांचे में रहा। केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन के माध्यम से क्षेत्र में आधुनिक प्रशासनिक एवं विकास व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया।

राज्योंरहा है। के पुनर्गठन के बाद हिमाचल प्रदेश को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला। चंबा भी इसी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बना रहा। इस दौर में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं के विकास पर धीरे-धीरे ध्यान बढ़ा।

1966 का महत्वपूर्ण परिवर्तन:

1 नवंबर 1966 को पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों के हिमाचल प्रदेश में विलय के बाद हिमाचल प्रदेश का क्षेत्र काफी बढ़ गया। चंबा जिला भी पुनर्गठित हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बना रहा। इसके बाद जिले के विकास के लिए राज्य स्तर पर अधिक व्यापक योजनाएं लागू होने लगीं।

रहा है।

25 जनवरी 1971:

हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। इसके साथ चंबा भी भारत के पूर्ण राज्य हिमाचल प्रदेश का एक जिला बन गया। इसके बाद जिले में लोकतांत्रिक संस्थाओं, पंचायती राज व्यवस्था और विकास योजनाओं का विस्तार हुआ।

आधुनिक चंबा

1971 के बाद चंबा में सड़क एवं परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, कृषि, बागवानी, विद्युत और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में धीरे-धीरे प्रगति हुई। दुर्गम पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां विकास की गति मैदानी क्षेत्रों की तुलना में चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास जारी रहा।

चंबा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए इसके प्राचीन मंदिरों, चंबा रूमाल, पहाड़ी चित्रकला, मिंजर मेला और अन्य पारंपरिक विरासतों को भी महत्व मिला। पर्यटन के विकास के साथ भरमौर, मणिमहेश, खज्जियार और चंबा नगर जैसे क्षेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए।

निष्कर्ष

इस प्रकार, 15 अप्रैल 1948 को रियासत के विलय से लेकर 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश के पूर्ण राज्य बनने तक चंबा ने राजशाही से लोकतांत्रिक शासन की ओर महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा। 1971 के बाद चंबा आधुनिक हिमाचल प्रदेश के एक महत्वपूर्ण जिले के रूप में विकसित हुआ और आज अपनी ऐतिहासिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक स्थलों, जनजातीय संस्कृति और पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है।

 


 


Rakesh Kumar

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